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Rigveda Mandal 1 / Sukta 68 / Mantra 8

191 Sukta
10 Mantra
1/68/8
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒च्छन्त॒ रेतो॑ मि॒थस्त॒नूषु॒ सं जा॑नत॒ स्वैर्दक्षै॒रमू॑राः ॥

इ॒च्छन्त॑ । रेतः॑ । मि॒थः । त॒नूषु॑ । सम् । जा॒न॒त॒ । स्वैः । दक्षैः॑ । अमू॑राः ॥

Mantra without Swara
इच्छन्त रेतो मिथस्तनूषु सं जानत स्वैर्दक्षैरमूराः ॥

इच्छन्त। रेतः। मिथः। तनूषु। सम्। जानत। स्वैः। दक्षैः। अमूराः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 12 Mantra » 8

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1 Bhashyas
Meaning
जो (निषत्तः) सर्वत्र स्थित (मनोः) मनुष्य के (अपत्ये) सन्तान में (रयीणाम्) राज्यश्री आदि धनों का (होता) देनेवाला है (सः) वह ईश्वर विद्युत् अग्नि (आसाम्) इन प्रजाओं का (पतिः) पालन करनेवाला है। हे (अमूराः) मूढ़पन आदि गुणों से रहित ज्ञानवाले ! (स्वैः) अपने (दक्षैः) शिक्षा सहित चतुराई आदि गुणों के साथ (तनूषु) शरीरों में वर्त्तमान होते हुए (मिथः) परस्पर (रेतः) विद्या शिक्षारूपी वीर्य का विस्तार करते हुए तुम लोग इस की (समिच्छन्त) अच्छे प्रकार शिक्षा करो (चित्) और तुम सब विद्याओं को (नु) शीघ्र (जानत) अच्छे प्रकार जानो ॥ ४ ॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि परस्पर मित्र हो और समग्र विद्याओं को शीघ्र जानकर निरन्तर आनन्द भोगें ॥ ४ ॥
Subject
फिर अध्यापक और शिष्य कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥