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Rigveda Mandal 1 / Sukta 68 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/68/10
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वि राय॑ और्णो॒द्दुरः॑ पुरु॒क्षुः पि॒पेश॒ नाकं॒ स्तृभि॒र्दमू॑नाः ॥

वि । रायः॑ । औ॒र्णो॒त् । दुरः॑ । पु॒रु॒ऽक्षुः । पि॒पेश॑ । नाक॑म् । स्तृऽभिः॑ । दमू॑नाः ॥

Mantra without Swara
वि राय और्णोद्दुरः पुरुक्षुः पिपेश नाकं स्तृभिर्दमूनाः ॥

वि। रायः। और्णोत्। दुरः। पुरुऽक्षुः। पिपेश। नाकम्। स्तृऽभिः। दमूनाः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 12 Mantra » 10

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1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो (तुरासः) अच्छे कर्मों को शीघ्र करनेवाले मनुष्य (पितुः) पिता के (पुत्राः) पुत्रों के (न) समान (अस्य) जगदीश्वर वा सत्पुरुष की (शासम्) शिक्षा को (श्रोषन्) सुनते हैं, वे सुखी होते हैं। जो (दमूनाः) शान्तिवाला (पुरुक्षुः) बहुत अन्नादि पदार्थों से युक्त (स्तृभिः) प्राप्त करने योग्य गुणों से (रायः) धनों के (व्यौर्णोत्) स्वीकारकर्त्ता तथा (नाकम्) सुख को स्वीकार कर और (दुरः) हिंसा करनेवाले शत्रुओं के (पिपेश) अवयवों को पृथक्-पृथक् करता है, उसी की सेवा सब मनुष्य करें ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर की आज्ञा पालने विना किसी मनुष्य का कुछ भी सुख सम्भव नहीं होता तथा जितेन्द्रियता आदि गुणों के विना किसी मनुष्य को सुख प्राप्त नहीं हो सकता। इससे ईश्वर की आज्ञा और जितेन्द्रियता आदि का सेवन अवश्य करें ॥ ५ ॥ इस सूक्त में ईश्वर और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥
Subject
फिर वे पढ़ने और पढ़ाने हारे कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥