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Rigveda Mandal 1 / Sukta 67 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/67/9
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वि यो वी॒रुत्सु॒ रोध॑न्महि॒त्वोत प्र॒जा उ॒त प्र॒सूष्व॒न्तः ॥

वि । यः । वी॒रुत्ऽसु॑ । रोध॑त् । म॒हि॒ऽत्वा । उ॒त । प्र॒ऽजाः । उ॒त । प्र॒ऽसूषु॑ । अ॒न्तरिति॑ ॥

Mantra without Swara
वि यो वीरुत्सु रोधन्महित्वोत प्रजा उत प्रसूष्वन्तः ॥

वि। यः। वीरुत्ऽसु। रोधत्। महिऽत्वा। उत। प्रऽजाः। उत। प्रऽसूषु। अन्तरिति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 11 Mantra » 9

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (धीराः) ज्ञानवाले विद्वान् मनुष्यो ! (संमाय) अच्छे प्रकार मान कर (सद्मेव) जैसे घर वा संग्राम के लिये जिस लाभ को (चक्रुः) करते हो, वैसे (यः) जो जगदीश्वर वा बिजुली (महित्वा) सत्कार करके (वीरुत्सु) रचना विशेष से निरोध प्राप्त हुए कारण-कार्य द्रव्यों में (प्रजाः) प्रजा (विरोधत्) विशेष कर के आवरण करता है, जो (उत) (प्रसूषु) उत्पन्न होनेवालों में भी (अन्तः) मध्य में वर्त्तमान है, जो (उत) (विश्वायुः) पूर्ण आयुयुक्त भी (चित्तिः) अच्छे प्रकार जाननेवाला (दमे) शान्तियुक्त घर तथा (अपाम्) प्राण वा जलों के मध्य में प्रजा को धारण करता है, उसकी सेवा अच्छे प्रकार करो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि जो अन्तर्यामीरूप तथा रूप वेगादि गुणों से प्रजा में नियत (संयमन) करता है, उसी जगदीश्वर की उपासना और विद्युत् अग्नि को अपने कार्यों में संयुक्त करके जैसे विद्वान् लोग घर में स्थित हुए संग्राम में शत्रुओं को जीत कर सुखी करते हैं, वैसे सुखी करे ॥ ५ ॥ इस सूक्त में ईश्वर, सभाध्यक्ष और विद्युत्, अग्नि के गुणों का वर्णन होने से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस सूक्तार्थ की सङ्गति जाननी चाहिये ॥
Subject
अब अगले मन्त्र में ईश्वर और विद्युत् अग्नि के गुणों का वर्णन किया है ॥