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Rigveda Mandal 1 / Sukta 67 / Mantra 3

191 Sukta
10 Mantra
1/67/3
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
हस्ते॒ दधा॑नो नृ॒म्णा विश्वा॒न्यमे॑ दे॒वान्धा॒द्गुहा॑ नि॒षीद॑न् ॥

हस्ते॑ । दधा॑नः । नृ॒म्णा । विश्वा॑नि । अमे॑ । दे॒वान् । धा॒त् । गुहा॑ । नि॒ऽसीद॑न् ॥

Mantra without Swara
हस्ते दधानो नृम्णा विश्वान्यमे देवान्धाद्गुहा निषीदन् ॥

हस्ते। दधानः। नृम्णा। विश्वानि। अमे। देवान्। धात्। गुहा। निऽसीदन् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 11 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (नरः) प्राप्ति करनेवाला मनुष्य जैसे (धियन्धाः) प्रज्ञा, कर्म को धारण करनेवाले विद्वान् लोग (तष्टान्) विद्याओं को तीक्ष्ण करनेवाले (मन्त्रान्) वेदों के अवयव वा विचाररूपी मन्त्रों को (विदन्ति) जानते (अशंसन्) स्तुति करते हैं। जैसे देनेवाला उदार मनुष्य (हस्ते) हाथ में (विश्वानि) सब (नृम्णा) धनों को (दधानः) धारण किया हुआ अन्य सुपात्र मनुष्यों को देता है। जैसे (गुहा) सब विद्याओं से युक्त बुद्धि में (निषीदन्) स्थित हुआ ईश्वर वा योगी विद्वान् (अत्र) इस (अमे) विज्ञान आदि में (देवान्) विद्वान् व दिव्य गुणों को (धात्) धारण करता है, वैसे होते हैं, वे अत्यन्त आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम लोगों को चाहिये कि जो अन्तर्यामी आत्मा में सत्य-झूँठ का उपदेश करता और बाह्य अध्ययन करानेवाला विद्वान् वर्त्तमान है, उसको छोड़ कर किसी की उपासना वा संगत कभी मत करो ॥ २ ॥
Subject
फिर वह विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥