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Rigveda Mandal 1 / Sukta 67 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/67/2
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
क्षेमो॒ न सा॒धुः क्रतु॒र्न भ॒द्रो भुव॑त्स्वा॒धीर्होता॑ हव्य॒वाट् ॥

क्षेमः॑ । न । सा॒धुः । क्रतुः॑ । न । भ॒द्रः । भुव॑त् । सु॒ऽआ॒धीः । होता॑ । ह॒व्य॒ऽवाट् ॥

Mantra without Swara
क्षेमो न साधुः क्रतुर्न भद्रो भुवत्स्वाधीर्होता हव्यवाट् ॥

क्षेमः। न। साधुः। क्रतुः। न। भद्रः। भुवत्। सुऽआधीः। होता। हव्यऽवाट् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 11 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो विद्वान् (वनेषु) सम्यक् सेवने योग्य पदार्थ (जायुः) जीतने के हेतु सूर्य्य के समान (अजुर्य्यम्) युद्धविद्या से सङ्गत सेना के तुल्य योग्य (श्रुष्टिम्) शीघ्रता करनेवाले को (राजेव) राजा के समान (क्षेमः) रक्षक (साधुः) सत्पुरुष के समान (भद्रः) कल्याणकारी (क्रतुर्न) उत्तम बुद्धि और कर्मकर्त्ता के तुल्य (स्वाधीः) अच्छे प्रकार धारण करने (होता) देने तथा अनुग्रह करने और (हव्यवाट्) लेने-देने योग्य पदार्थों का प्राप्त करानेवाला (भुवत्) हो तथा धर्मात्मा मनुष्यों को (वृणीते) स्वीकार करे, उसका सदा सेवन करो ॥ १ ॥
Essence
इस मन्त्रा में उपमा और (वाचकलुप्तोपमालङ्कार) हैं। मनुष्यों को उचित कि विद्वानों का संग करके सदैव आनन्द भोग करें ॥ १ ॥
Subject
अब सड़सठवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् कैसा हो, इस विषय को कहा है ॥