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Rigveda Mandal 1 / Sukta 66 / Mantra 8

191 Sukta
10 Mantra
1/66/8
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
य॒मो ह॑ जा॒तो य॒मो जनि॑त्वं जा॒रः क॒नीनां॒ पति॒र्जनी॑नाम् ॥

य॒मः । ह॒ । जा॒तः । य॒मः । जनि॑ऽत्वम् । जा॒रः । क॒नीना॑म् । पतिः॑ । जनी॑नाम् ॥

Mantra without Swara
यमो ह जातो यमो जनित्वं जारः कनीनां पतिर्जनीनाम् ॥

यमः। ह। जातः। यमः। जनिऽत्वम्। जारः। कनीनाम्। पतिः। जनीनाम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 8

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो सेनापति (यमः) नियम करनेवाला (जातः) प्रकट (यमः) सर्वथा नियमकर्त्ता (जनित्वम्) जन्मादि कारणयुक्त (कनीनाम्) कन्यावत् वर्त्तमान रात्रियों के (जारः) आयु का हननकर्त्ता सूर्य के समान (जननीनाम्) उत्पन्न हुई प्रजाओं का (पतिः) पालनकर्त्ता (सृष्टा) प्रेरित (सेनेव) अच्छी शिक्षा को प्राप्त हुई वीर पुरुषों की विजय करनेवाली सेना के समान (अस्तुः) शत्रुओं के ऊपर अस्त्र-शस्त्र चलानेवाले (त्वेषप्रतीका) दीप्तियों के प्रतीति करनेवाले (दिद्युन्न) बिजुली के समान (अमम्) अपरिपक्व विज्ञानयुक्त जन को (दधाति) धारण करता है, उसका सेवन करो ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्या से अच्छे प्रयत्न द्वारा जैसे की हुई उत्तम शिक्षा से सिद्ध की हुई सेना शत्रुओं को जीत कर विजय करती है, जैसे धनुर्वेद के जाननेवाले विद्वान् लोग शत्रुओं के ऊपर शस्त्र-अस्त्रों को छोड़ उनका छेदन करके भगा देते हैं, वैसे उत्तम सेनापति सब दुःखों का नाश करता है, ऐसा तुम जानो ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥