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Rigveda Mandal 1 / Sukta 66 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/66/6
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
चि॒त्रो यदभ्रा॑ट्छ्वे॒तो न वि॒क्षु रथो॒ न रु॒क्मी त्वे॒षः सम॒त्सु॑ ॥

चि॒त्रः । यत् । अभ्रा॑ट् । श्वे॒तः । न । वि॒क्षु । रथः॑ । न । रु॒क्मी । त्वे॒षः । स॒मत्ऽसु॑ ॥

Mantra without Swara
चित्रो यदभ्राट्छ्वेतो न विक्षु रथो न रुक्मी त्वेषः समत्सु ॥

चित्रः। यत्। अभ्राट्। श्वेतः। न। विक्षु। रथः। न। रुक्मी। त्वेषः। समत्ऽसु ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो मनुष्य (क्रतुः) बुद्धि वा कर्म के (न) समान (नित्यः) अविनाशिस्वभाव (जायेव) भार्या के समान (योनौ) कारणरूप में (अरम्) अलंकर्त्ता (श्वेतः) शुद्ध शुक्लवर्ण के (न) समान (विक्षु) प्रजाओं में शुद्ध करने (रथः) सुवर्णादि से निर्मित विमानादि यान के (न) समान (रुक्मी) रुचि करनेवाले कर्म वा गुणयुक्त (दुरोकशोचिः) दूरस्थानों में दीप्तियुक्त (विश्वस्मै) सब जगत् के लिये सुख करने (समत्सु) संग्रामों में (चित्रः) अद्भुत स्वभावयुक्त (अभ्राट्) आप ही प्रकाशमान होने से शुद्ध (त्वेषः) प्रदीप्त स्वभाववाला है, वही चक्रवर्त्ति राजा होने के योग्य होता है ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो ज्ञान और कर्मकाण्ड के समान सदा वर्त्तमान, अनुकूल स्त्री के समान सुखों का निमित्त, सूर्य के समान शुभगुणों को प्रकाश करने, आश्चर्य गुणवाले रथ के समान मोक्ष में प्राप्त करने, वीर के समान युद्धों में विजय करनेवाला हो, वह राज्यलक्ष्मी को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥