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Rigveda Mandal 1 / Sukta 66 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/66/2
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तक्वा॒ न भूर्णि॒र्वना॑ सिषक्ति॒ पयो॒ न धे॒नुः शुचि॑र्वि॒भावा॑ ॥

तक्वा॑ । न । भूर्णिः॑ । वना॑ । सै॒स॒क्ति॒ । पयः॑ । न । धे॒नुः । शुचिः॑ । वि॒भाऽवा॑ ॥

Mantra without Swara
तक्वा न भूर्णिर्वना सिषक्ति पयो न धेनुः शुचिर्विभावा ॥

तक्वा। न। भूर्णिः। वना। सिसक्ति। पयः। न। धेनुः। शुचिः। विभाऽवा ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! आप सब लोग (रयिर्न) द्रव्यसमूह के समान (चित्रा) आश्चर्य गुणवाले (सूरः) सूर्य्य के (न) समान (संदृक्) अच्छे प्रकार दिखानेवाला (आयुः) जीवन के (न) समान (प्राणः) सब शरीर में रहनेवाला (नित्यः) कारणरूप से अविनाशिस्वरूप वायु के (न) समान (सूनुः) कार्य्यरूप से वायु के पुत्र के तुल्य वर्त्तमान (पयः) दूध के (न) समान (धेनुः) दूध देनेवाली गौ (तक्वा) चोर के (न) समान (भूर्णिः) धारण करने (विभावा) अनेक पदार्थों का प्रकाश करनेवाला (शुचिः) पवित्र अग्नि (वना) वन वा किरणों को (सिसक्ति) संयुक्त होता वा संयोग करता है, उसको यथावत् जान के कार्यों में उपयुक्त करो ॥ १ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जिस ईश्वर ने प्रजा के हित के लिए बहुत गुणवाले अनेक कार्य्यों के उपयोगी सत्य स्वभाववाले इस अग्नि को रचा है, उसी की सदा उपासना करें ॥ १ ॥
Subject
अब छासठवें सूक्त का आरम्भ किया जाता है। इसके प्रथम मन्त्र में पूर्वोक्त अग्नि के गुणों का उपदेश किया है ॥