Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 66 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/66/10
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सिन्धु॒र्न क्षोदः॒ प्र नीची॑रैनो॒न्नव॑न्त॒ गावः॒ स्व१॒॑र्दृशी॑के ॥

सिन्धुः॒ । न । क्षोदः॑ । प्र । नीचीः॑ । ऐ॒नो॒त् । नव॑न्ते । गावः॑ । स्वः॑ । दृशी॑के ॥

Mantra without Swara
सिन्धुर्न क्षोदः प्र नीचीरैनोन्नवन्त गावः स्व१र्दृशीके ॥

सिन्धुः। न। क्षोदः। प्र। नीचीः। ऐनोत्। नवन्ते। गावः। स्वः। दृशीके ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 10

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (चराथा) चररूप (वसत्या) वास करने योग्य पृथिवी के सह वर्त्तमान (गावः) गौ (न) जैसे (अस्तम्) घर को (नक्षन्ते) प्राप्त होती जैसे (गावः) किरण (स्वर्दृशीके) देखने के हेतु व्यवहार में (इद्धम्) सूर्य्य को (नवन्ते) प्राप्त होते हैं (न) जैसे (सिन्धुः) समुद्र (नीचीः) नीचे के (क्षोदः) जल को प्राप्त होता है, वैसे (वः) तुम लोगों को (प्रैनोत्) प्राप्त होता है, उसी की सेवा हम लोग करें ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सभापति आदि इस प्रकार परमेश्वर का सेवन और विद्युत् अग्नि को सिद्ध करते हैं, उनको जैसे गौ, घर और किरण सूर्य को प्राप्त होते हैं और जैसे मनुष्य समुद्र को प्राप्त होके नाना प्रकार के कामों को सुशोभित (सिद्ध) करता है, वैसे ही सज्जन पुरुषों को उचित है कि अन्तर्य्यामी परमेश्वर की उपासना तथा विद्युत् विद्या को यथावत् सिद्ध करके अपनी सब कामनाओं को पूर्ण करें ॥ ५ ॥ इस सूक्त में ईश्वर और अग्नि के गुणों का वर्णन होने इस सूक्त की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥
Subject
फिर पूर्वोक्त कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥