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Rigveda Mandal 1 / Sukta 65 / Mantra 6

191 Sukta
10 Mantra
1/65/6
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अत्यो॒ नाज्म॒न्त्सर्ग॑प्रतक्तः॒ सिन्धु॒र्न क्षोदः॒ क ईं॑ वराते ॥

अत्यः॑ । न । अज्म॑न् । सर्ग॑ऽप्रतक्तः । सिन्धुः॑ । न । क्षोदः॑ । कः । इ॒म् । व॒रा॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
अत्यो नाज्मन्त्सर्गप्रतक्तः सिन्धुर्न क्षोदः क ईं वराते ॥

अत्यः। न। अज्मन्। सर्गऽप्रतक्तः। सिन्धुः। न। क्षोदः। कः। इम्। वराते ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 9 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
जो मनुष्य उस परमेश्वर को (रण्वा) सुख से प्राप्त करानेवाला (पुष्टिः) शरीर आत्मा और इन्द्रियों की पुष्टि के (न) समान (क्षोदः) जल (शम्भु) सुख सम्पन्न करनेवाले के (न) समान तथा (अज्मन्) मार्ग में (अत्यः) घोड़े के समान (सर्गप्रतक्तः) जल को संकोच करनेवाले (सिन्धुः) समुद्र (क्षोदः) जल के (न) समान (ईम्) जानने तथा प्राप्त करने योग्य परमेश्वर वा बिजुलीरूप अग्नि को (कः) कौन विद्वान् मनुष्य (वराते) स्वीकार करता है ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। कोई विद्वान् मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त होके और बिजुलीरूप अग्नि जान के उससे उपकार लेने को समर्थ होता है, जैसे उत्तम पुष्टि, पृथिवी का राज्य, मेघ की वृष्टि, उत्तम जल, उत्तम घोड़े और समुद्र बहुत सुखों को प्राप्त कराते हैं, वैसे ही परमेश्वर और बिजुली भी सब आनन्दों को प्राप्त कराते हैं, परन्तु इन दोनों का जाननेवाला विद्वान् मनुष्य दुर्लभ है ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह परमात्मा कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥