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Rigveda Mandal 1 / Sukta 65 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/65/5
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
पु॒ष्टिर्न र॒ण्वा क्षि॒तिर्न पृ॒थ्वी गि॒रिर्न भुज्म॒ क्षोदो॒ न शं॒भु ॥

पु॒ष्टिः । न । र॒ण्वा । क्षि॒तिः । न । पृ॒थ्वी । गि॒रिः । न । भुज्म॑ । क्षोदः॑ । न । श॒म्ऽभु ॥

Mantra without Swara
पुष्टिर्न रण्वा क्षितिर्न पृथ्वी गिरिर्न भुज्म क्षोदो न शंभु ॥

पुष्टिः। न। रण्वा। क्षितिः। न। पृथ्वी। गिरिः। न। भुज्म। क्षोदः। न। शम्ऽभु ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 9 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
जो मनुष्य उस परमेश्वर को (रण्वा) सुख से प्राप्त करानेवाला (पुष्टिः) शरीर आत्मा और इन्द्रियों की पुष्टि के (न) समान (क्षोदः) जल (शम्भु) सुख सम्पन्न करनेवाले के (न) समान तथा (अज्मन्) मार्ग में (अत्यः) घोड़े के समान (सर्गप्रतक्तः) जल को संकोच करनेवाले (सिन्धुः) समुद्र (क्षोदः) जल के (न) समान (ईम्) जानने तथा प्राप्त करने योग्य परमेश्वर वा बिजुलीरूप अग्नि को (कः) कौन विद्वान् मनुष्य (वराते) स्वीकार करता है ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। कोई विद्वान् मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त होके और बिजुलीरूप अग्नि जान के उससे उपकार लेने को समर्थ होता है, जैसे उत्तम पुष्टि, पृथिवी का राज्य, मेघ की वृष्टि, उत्तम जल, उत्तम घोड़े और समुद्र बहुत सुखों को प्राप्त कराते हैं, वैसे ही परमेश्वर और बिजुली भी सब आनन्दों को प्राप्त कराते हैं, परन्तु इन दोनों का जाननेवाला विद्वान् मनुष्य दुर्लभ है ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह परमात्मा कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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