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Rigveda Mandal 1 / Sukta 65 / Mantra 4

191 Sukta
10 Mantra
1/65/4
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वर्ध॑न्ती॒मापः॑ प॒न्वा सुशि॑श्विमृ॒तस्य॒ योना॒ गर्भे॒ सुजा॑तम् ॥

वर्ध॑न्ति । ई॒म् । आपः॑ । प॒न्वा । सुऽशि॑श्विम् । ऋ॒तस्य॑ । योना॑ । गर्भे॑ । सुऽजा॑तम् ॥

Mantra without Swara
वर्धन्तीमापः पन्वा सुशिश्विमृतस्य योना गर्भे सुजातम् ॥

वर्धन्ति। ईम्। आपः। पन्वा। सुऽशिश्विम्। ऋतस्य। योना। गर्भे। सुऽजातम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 9 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (न) जैसे विद्वान् लोग (परिष्टिः) सब प्रकार खोजने योग्य (द्यौः) सूर्य्य के प्रकाश के तुल्य (भुवत्) होकर व पदार्थों को दृष्टिगोचर करते हैं, वैसे (ऋतस्य) सत्य धर्म स्वरूप आज्ञा विज्ञान से (व्रता) सत्यभाषण आदि नियमों को (अनुगुः) प्राप्त होकर आचरण करते हैं, तथा जैसे ये (ऋतस्य) कारणरूपी सत्य की (योना) योनि अर्थात् निमित्त में स्थित (सुजातम्) अच्छी प्रकार प्रसिद्ध (सुशिश्विम्) अच्छे पढ़ानेवाले सभापति की (पन्वा) स्तुति करने योग्य कर्म्म से (ईम्) पृथिवी को (आपः) जल वा प्राण को (वर्धन्ति) बढ़ा कर ज्ञानयुक्त कर देते हैं, वैसे हम लोग (भूम) होवें और तुम भी होओ ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य के प्रकाश से सब पदार्थ दृष्टि में आते हैं, वैसे ही विद्वानों के संग से वेदविद्या के उत्पन्न होने और धर्म्माचरण की प्रवृत्ति में परमेश्वर और बिजुली आदि पदार्थ अपने-अपने गुण, कर्म, स्वभावों से अच्छे प्रकार देखे जाते हैं, ऐसा तुम लोग जान कर अपने विचार से निश्चित करो ॥ २ ॥
Subject
फिर उसको किस प्रकार हम लोग जानें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥