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Rigveda Mandal 1 / Sukta 65 / Mantra 10

191 Sukta
10 Mantra
1/65/10
Devata- अग्निः Rishi- पराशरः शाक्तः Chhanda- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सोमो॒ न वे॒धा ऋ॒तप्र॑जातः प॒शुर्न शिश्वा॑ वि॒भुर्दू॒रेभाः॑ ॥

सोमः॑ । न । वे॒धाः । ऋ॒तऽप्र॑जातः । प॒शुः । न । शिश्वा॑ । वि॒ऽभुः । दू॒रेऽभाः॑ ॥

Mantra without Swara
सोमो न वेधा ऋतप्रजातः पशुर्न शिश्वा विभुर्दूरेभाः ॥

सोमः। न। वेधाः। ऋतऽप्रजातः। पशुः। न। शिश्वा। विऽभुः। दूरेऽभाः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 9 Mantra » 10

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो (अप्सु) जलों में (हंसः) पक्षी के (न) समान (सीदन्) जाता-आता डूबता-उछलता हुआ (विशाम्) प्रजाओं को (उषर्भुत्) प्रातःकाल में बोध कराने वा (क्रत्वा) अपनी बुद्धि वा कर्म्म से (चेतिष्ठः) अत्यन्त ज्ञान करानेवाले (सोमः) ओषधिसमूह के (न) समान (ऋतप्रजातः) कारण से उत्पन्न होकर वायु जल में प्रसिद्ध (वेधाः) पुष्ट करनेवाले (शिशुना) बछड़ा आदि से (पशुः) गौ आदि के (न) समान (विभुः) व्यापक हुआ (दूरेभाः) दूरदेश में दीप्तियुक्त बिजुली आदि अग्नि के समान (श्वसिति) प्राण, अपान आदि को करता है, उसको शिल्पादि कार्यों में संप्रयुक्त करो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बिजुली के विना किसी मनुष्य के व्यवहार की सिद्धि नहीं हो सकती। इस अग्निविद्या से परीक्षा करके कार्यों में संयुक्त किया हुआ अग्नि बहुत सुखों को सिद्ध करता है ॥ ५ ॥ इस सूक्त में ईश्वर, अग्निरूप बिजुली के वर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥
Subject
फिर वह सभेश कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥