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Rigveda Mandal 1 / Sukta 64 / Mantra 9

191 Sukta
15 Mantra
1/64/9
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
रोद॑सी॒ आ व॑दता गणश्रियो॒ नृषा॑चः शूराः॒ शव॒साहि॑मन्यवः। आ व॒न्धुरे॑ष्व॒मति॒र्न द॑र्श॒ता वि॒द्युन्न त॑स्थौ मरुतो॒ रथे॑षु वः ॥

रोद॑सी॒ इति॑ । आ । व॒द॒त॒ । ग॒ण॒ऽश्रि॒यः॒ । नृऽसा॑चः । शूराः॑ । शव॑सा । अहि॑ऽमन्यवः । आ । व॒न्धुरे॑षु । अ॒मतिः॑ । न । द॒र्श॒ता । वि॒द्युत् । न । त॒स्थौ॒ । म॒रु॒तः॒ । रथे॑षु । वः॒ ॥

Mantra without Swara
रोदसी आ वदता गणश्रियो नृषाचः शूराः शवसाहिमन्यवः। आ वन्धुरेष्वमतिर्न दर्शता विद्युन्न तस्थौ मरुतो रथेषु वः ॥

रोदसी इति। आ। वदत। गणऽश्रियः। नृऽसाचः। शूराः। शवसा। अहिऽमन्यवः। आ। वन्धुरेषु। अमतिः। न। दर्शता। विद्युत्। न। तस्थौ। मरुतः। रथेषु। वः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 7 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (गणश्रियः) इकट्ठे होके शोभा को प्राप्त होने (नृषाचः) मनुष्यों को कर्मों में संयुक्त करने और (अहिमन्यवः) अपनी व्याप्ति को जाननेवाले (शूराः) शूरवीर के तुल्य (मरुतः) शिल्पविद्या के जाननेवाले ऋत्विज् विद्वान् लोग जो (अमतिर्न) जैसे रूप तथा (दर्शता) देखने योग्य (विद्युत्) बिजुली (तस्थौ) वर्त्तमान होती वैसे वर्त्तमान वायु (बन्धुरेषु) यानयन्त्रों के बन्धनों में जो (शवसा) बल से (रोदसी) प्रकाश और भूमि को धारण करते हैं तथा जो (वः) तुम लोगों के (रथेषु) रथों में जोड़े हुए कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, उनका हम लोगों के लिये (आवदत) उपदेश कीजिये ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को जानना योग्य है कि सब मूर्तिमान् द्रव्यों के आधार, शूरवीरता के तुल्य तथा शिल्पविद्या और अन्य कार्य्यों के हेतु मुख्य करके पवन ही हैं, अन्य नहीं ॥ ९ ॥
Subject
फिर पूर्वोक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥