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Rigveda Mandal 1 / Sukta 64 / Mantra 5

191 Sukta
15 Mantra
1/64/5
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ई॒शा॒न॒कृतो॒ धुन॑यो रि॒शाद॑सो॒ वाता॑न्वि॒द्युत॒स्तवि॑षीभिरक्रत। दु॒हन्त्यूध॑र्दि॒व्यानि॒ धूत॑यो॒ भूमिं॑ पिन्वन्ति॒ पय॑सा॒ परि॑ज्रयः ॥

ई॒शा॒न॒ऽकृतः॑ । धुन॑यः । रि॒शाद॑सः । वाता॑न् । वि॒ऽद्युतः॑ । तवि॑षीभिः । अ॒क्र॒त॒ । दु॒हन्ति॑ । ऊधः॑ । दि॒व्यानि॑ । धूत॑यः । भूमि॑म् । पि॒न्व॒न्ति॒ । पय॑सा । परि॑ऽज्रयः ॥

Mantra without Swara
ईशानकृतो धुनयो रिशादसो वातान्विद्युतस्तविषीभिरक्रत। दुहन्त्यूधर्दिव्यानि धूतयो भूमिं पिन्वन्ति पयसा परिज्रयः ॥

ईशानऽकृतः। धुनयः। रिशादसः। वातान्। विऽद्युतः। तविषीभिः। अक्रत। दुहन्ति। ऊधः। दिव्यानि। धूतयः। भूमिम्। पिन्वन्ति। पयसा। परिऽज्रयः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो ये (ईशानकृतः) जीवों के ऐश्वर्य्ययुक्त करने (धुनयः) धूलि के वर्षाने, वृक्ष आदि के कम्पाने (रिशादसः) जीवों को दुःख देनेवाले रोगों के नाश करने (धूतयः) सब पदार्थों को कम्पाने और (परिज्रयः) सब ओर से पदार्थों को जीर्ण करनेवाले वायु (तविषीभिः) अपने बलों से (विद्युतः) बिजुली आदि को (अक्रत) उत्पन्न करते हैं तथा जो (पयसा) जल वा रस से (ऊधः) उषा को (दुहन्ति) पूर्ण करते हैं, जो (भूमिम्) पृथिवी (दिव्यानि) शुद्ध जल आदि वस्तु तथा उत्तम कार्य्यों का (पिन्वन्ति) सेवन या सेचन करते हैं (वातान्) उन पवनों को जानो ॥ ५ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम लोगों के लिये परमेश्वर वायु के गुणों का उपदेश करता है कि कहे वा न कहे गुणवाले वायु बिजुली को उत्पन्न करके वर्षा द्वारा भूमि पर ओषधि आदि के सेचन से सब प्राणियों को सुख देनेवाले होते हैं, ऐसा तुम सब लोग जानो ॥ ५ ॥
Subject
फिर उक्त वायु कैसे हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥