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Rigveda Mandal 1 / Sukta 64 / Mantra 4

191 Sukta
15 Mantra
1/64/4
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
चि॒त्रैर॒ञ्जिभि॒र्वपु॑षे॒ व्य॑ञ्जते॒ वक्षः॑सु रु॒क्माँ अधि॑ येतिरे शु॒भे। अंसे॑ष्वेषां॒ नि मि॑मृक्षुर्ऋ॒ष्टयः॑ सा॒कं ज॑ज्ञिरे स्व॒धया॑ दि॒वो नरः॑ ॥

चि॒त्रैः । अ॒ञ्जिऽभिः॑ । वपु॑षे । वि । अ॒ञ्ज॒ते॒ । वक्षः॑ऽसु । रु॒क्मान् । अधि॑ । ये॒ति॒रे॒ । शु॒भे । अंसे॑षु । ए॒षा॒म् । नि । मि॒मृ॒क्षुः॒ । ऋ॒ष्टयः॑ । सा॒कम् । ज॒ज्ञि॒रे॒ । स्व॒धया॑ । दि॒वः । नरः॑ ॥

Mantra without Swara
चित्रैरञ्जिभिर्वपुषे व्यञ्जते वक्षःसु रुक्माँ अधि येतिरे शुभे। अंसेष्वेषां नि मिमृक्षुर्ऋष्टयः साकं जज्ञिरे स्वधया दिवो नरः ॥

चित्रैः। अञ्जिऽभिः। वपुषे। वि। अञ्जते। वक्षःऽसु। रुक्मान्। अधि। येतिरे। शुभे। अंसेषु। एषाम्। नि। मिमृक्षुः। ऋष्टयः। साकम्। जज्ञिरे। स्वधया। दिवः। नरः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 6 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो ये (ऋष्टयः) इधर-उधर चलने तथा (नरः) पदार्थों को प्राप्त करनेवाले पवन (चित्रैः) आश्चर्य्यरूप क्रिया, गुण और स्वभाव तथा (अञ्जिभिः) प्रकट करना आदि धर्मों से (शुभे) सुन्दर (वपुषे) शरीर के धारण वा पोषण के लिये (व्यञ्जते) विशेष करके प्राप्त होते हैं, जो (वक्षःसु) हृदयों में (रुक्मान्) बिजुली तथा जाठराग्नि के प्रकाशों को (अधियेतिरे) यत्नपूर्वक सिद्ध करते (स्वधया) पृथिवी, आकाश तथा अन्न के (साकम्) साथ (जायन्ते) उत्पन्न होते और (दिवः) सूर्य आदि के प्रकाशों को उत्पन्न करते हैं, (एषाम्) इन पवनों के योग से (अंसेषु) बल, पराक्रम के मूल कन्धों में (निमिमृक्षुः) सब पदार्थ समूह को प्राप्त हो सकते हैं, उनको यथावत् जानकर अपने कार्य्यों में सम्प्रयुक्त करो ॥ ४ ॥
Essence
विद्वानों को उचित है कि ऐसे-ऐसे विलक्षण गुणवाले वायुओं को जानकर शुद्ध-शुद्ध सुखों को भोगें ॥ ४ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥