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Rigveda Mandal 1 / Sukta 64 / Mantra 3

191 Sukta
15 Mantra
1/64/3
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
युवा॑नो रु॒द्रा अ॒जरा॑ अभो॒ग्घनो॑ वव॒क्षुरध्रि॑गावः॒ पर्व॑ताइव। दृ॒ळ्हा चि॒द्विश्वा॒ भुव॑नानि॒ पार्थि॑वा॒ प्र च्या॑वयन्ति दि॒व्यानि॑ म॒ज्मना॑ ॥

युवा॑नः । रु॒द्राः । अ॒जराः॑ । अ॒भो॒क्ऽहनः॑ । व॒व॒क्षुः । अध्रि॑ऽगावः । पर्व॑ताःऽइव । दृ॒ळ्हा । चि॒त् । विश्वा॑ । भुव॑नानि । पार्थि॑वा । प्र । च्या॒व॒य॒न्ति॒ । दि॒व्यानि॑ । म॒ज्मना॑ ॥

Mantra without Swara
युवानो रुद्रा अजरा अभोग्घनो ववक्षुरध्रिगावः पर्वताइव। दृळ्हा चिद्विश्वा भुवनानि पार्थिवा प्र च्यावयन्ति दिव्यानि मज्मना ॥

युवानः। रुद्राः। अजराः। अभोक्ऽहनः। ववक्षुः। अध्रिऽगावः। पर्वताःऽइव। दृळ्हा। चित्। विश्वा। भुवनानि। पार्थिवा। प्र। च्यावयन्ति। दिव्यानि। मज्मना ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जो ये (पर्वताइव) पर्वत वा मेघ के समान धारण करनेवाले (युवानः) पदार्थों के मिलाने तथा पृथक् करने में बड़े बलवान् (अभोग्घनः) भोजन करने तथा मरने से पृथक् (अध्रिगावः) किरणों को नहीं धारण करनेवाले अर्थात् प्रकाशरहित (अजराः) जन्म लेके वृद्ध होना, फिर मरना इत्यादि कामों से रहित तथा कारणरूप से नित्य (रुद्राः) ज्वर आदि की पीडा से रुलानेवाले वायु जीवों को (ववक्षुः) रुष्ट करते हैं (मज्मना) बल से (पार्थिवा) भूगोल आदि (दिव्यानि) प्रकाश में रहनेवाले सूर्य आदि लोक (चित्) और (विश्वा) सब (भुवनानि) लोक (दृढा) दृढ़ स्थिरों को भी (प्रच्यावयन्ति) चलायमान करते हैं, उनको विद्या से यथावत् जानकर कार्य्यों के बीच लगाओ ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे मेघ जलों के आधार और पर्वत ओषधि आदि के आधार हैं, वैसे ही ये संयोग-वियोग करनेवाले, सबके आधार, सुख-दुःख होने के हेतु, नित्यरूप, गुण से अलग, स्पर्श गुणवाले पवन हैं, ऐसा समझना योग्य है। और इन्हींके विना जल, अग्नि और भूगोल तथा इनके परमाणु भी जान-आने तथा ठहरने को समर्थ नहीं हो सकते ॥ ३ ॥
Subject
फिर भी पूर्वोक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥