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Rigveda Mandal 1 / Sukta 64 / Mantra 2

191 Sukta
15 Mantra
1/64/2
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ते ज॑ज्ञिरे दि॒व ऋ॒ष्वास॑ उ॒क्षणो॑ रु॒द्रस्य॒ मर्या॒ असु॑रा अरे॒पसः॑। पा॒व॒कासः॒ शुच॑यः॒ सूर्या॑इव॒ सत्वा॑नो॒ न द्र॒प्सिनो॑ घो॒रव॑र्पसः ॥

ते । ज॒ज्ञि॒रे॒ । दि॒वः । ऋ॒ष्वासः॑ । उ॒क्षणः॑ । रु॒द्रस्य॑ । मर्या॑ । असु॑राः । अ॒रे॒पसः॑ । पा॒व॒कासः॒ । शुच॑यः । सूर्याः॑ऽइव । सत्वा॑नः । न । द्र॒प्सिनः॑ । घो॒रऽव॑र्पसः ॥

Mantra without Swara
ते जज्ञिरे दिव ऋष्वास उक्षणो रुद्रस्य मर्या असुरा अरेपसः। पावकासः शुचयः सूर्याइव सत्वानो न द्रप्सिनो घोरवर्पसः ॥

ते। जज्ञिरे। दिवः। ऋष्वासः। उक्षणः। रुद्रस्य। मर्या। असुराः। अरेपसः। पावकासः। शुचयः। सूर्याःऽइव। सत्वानः। न। द्रप्सिनः। घोरऽवर्पसः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 6 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोगों को उचित है कि जो (रुद्रस्य) जीव वा प्राण के सम्बन्धी पवन (दिवः) प्रकाश से (जज्ञिरे) उत्पन्न होते हैं जो (सूर्याइव) सूर्य के किरणों के समान (ऋष्वासः) ज्ञान के हेतु (उक्षणः) सेचन और (पावकासः) पवित्र करनेवाले (शुचयः) शुद्ध जो (सत्वानः) बल पराक्रमवाले प्राणियों के (न) समान (मर्याः) मरणधर्मयुक्त (असुराः) प्रकाशरहित (अरेपसः) पापों से पृथक् (द्रप्सिनः) नाना प्रकार के मोहों से युक्त (घोरवर्पसः) भयङ्कर वायु के हैं (ते) उन्हीं के संग से विद्यादि उत्तम गुणों का ग्रहण करो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जैसे ईश्वर की सृष्टि में सिंह, हाथी और मनुष्य आदि प्राणी बलवान् होते हैं, वैसे वायु भी है। जैसे सूर्य की किरणें पवित्र करनेवाली हैं, वैसे वायु भी। इन दोनों के बिना, रोग, रोग का नाश, मरण और जन्म आदि व्यवहार नहीं हो सकते। इससे मनुष्यों को चाहिये कि इनके गुणों को जानके सब कार्यों में यथावत् संप्रयोग करें ॥ २ ॥
Subject
फिर भी उक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥