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Rigveda Mandal 1 / Sukta 64 / Mantra 15

191 Sukta
15 Mantra
1/64/15
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नू ष्ठि॒रं म॑रुतो वी॒रव॑न्तमृती॒षाहं॑ र॒यिम॒स्मासु॑ धत्त। स॒ह॒स्रिणं॑ श॒तिनं॑ शूशु॒वांसं॑ प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥

नु । स्थि॒रम् । म॒रु॒तः॒ । वी॒रऽव॑न्तम् । ऋ॒ति॒ऽसह॑म् । र॒यिम् । अ॒स्मासु॑ । ध॒त्त॒ । स॒ह॒स्रिण॑म् । श॒तिन॑म् । शू॒शु॒ऽवांस॑म् । प्रा॒तः । म॒क्षु । धि॒याऽव॑सुः । ज॒ग॒म्या॒त् ॥

Mantra without Swara
नू ष्ठिरं मरुतो वीरवन्तमृतीषाहं रयिमस्मासु धत्त। सहस्रिणं शतिनं शूशुवांसं प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात् ॥

नु। स्थिरम्। मरुतः। वीरऽवन्तम्। ऋतिऽसहम्। रयिम्। अस्मासु। धत्त। सहस्रिणम्। शतिनम्। शूशुऽवांसम्। प्रातः। मक्षु। धियाऽवसुः। जगम्यात् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 8 Mantra » 5

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Meaning
हे (मरुतः) पवन के तुल्य वर्त्तमान ! जैसे विद्वान् लोग (अस्मासु) हम लोगों में (स्थिरम्) निश्चल (वीरवन्तम्) प्रशंसा करने योग्य वीर पुरुषों से युक्त (ऋतिषाहम्) सत्य के सहन करनेवाले (रयिम्) विद्याराज्य और सुवर्ण आदि धन को धारण करें और (धियावसुः) बुद्धि और कर्मों से युक्त विद्वान् (जगम्यात्) शीघ्र प्राप्त हों, वैसे उनको तुम (प्रातः) प्रतिदिन (मक्षु) शीघ्र (धत्त) धारण करो ॥ १५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे अति प्रशंसा करने योग्य, बुद्धिवाला, विद्या, पुरुषार्थों से युक्त विद्वान् जन वायु आदि पदार्थों के सकाश से दृढ़ निश्चल बहुत सुखों को सिद्ध करके आनन्द को प्राप्त होता है, वैसे तुम भी इस विद्या को प्राप्त होकर आनन्द भोगो ॥ १५ ॥ । इस सूक्त में वायु के गुणों का उपदेश करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥
Subject
फिर वे उक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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