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Rigveda Mandal 1 / Sukta 64 / Mantra 13

191 Sukta
15 Mantra
1/64/13
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र नू स मर्तः॒ शव॑सा॒ जनाँ॒ अति॑ त॒स्थौ व॑ ऊ॒ती म॑रुतो॒ यमाव॑त। अर्व॑द्भि॒र्वाजं॑ भरते॒ धना॒ नृभि॑रा॒पृच्छ्यं॒ क्रतु॒मा क्षे॑ति॒ पुष्य॑ति ॥

प्र । नु । सः । मर्तः॑ । शव॑सा । जना॑न् । अति॑ । त॒स्थौ । वः॒ । ऊ॒ती । म॒रुतः॑ । यम् । आव॑त । अर्व॑त्ऽभिः॑ । वाज॑म् । भ॒र॒ते॒ । धना॑ । नृऽभिः॑ । आ॒ऽपृच्छ्य॑म् । क्रतु॑म् । आ । क्षे॒ति॒ । पुष्य॑ति ॥

Mantra without Swara
प्र नू स मर्तः शवसा जनाँ अति तस्थौ व ऊती मरुतो यमावत। अर्वद्भिर्वाजं भरते धना नृभिरापृच्छ्यं क्रतुमा क्षेति पुष्यति ॥

प्र। नु। सः। मर्तः। शवसा। जनान्। अति। तस्थौ। वः। ऊती। मरुतः। यम्। आवत। अर्वत्ऽभिः। वाजम्। भरते। धना। नृऽभिः। आऽपृच्छ्यम्। क्रतुम्। आ। क्षेति। पुष्यति ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) युक्ति से सेवन किये हुए वायु के समान तुम (यम्) जिस मनुष्य की (आवत) रक्षा आदि करते हो (सः) वह (मर्त्तः) मनुष्य (ऊती) रक्षा आदि के सहित (शवसा) विद्या क्रियायुक्त बल (अर्वद्भिः) घोड़ों और (नृभिः) मनुष्यों के साथ (वाजम्) वेग अन्न (वः) तुम (जनान्) मनुष्यादि प्राणियों और (धना आ पृच्छ्यम्) धनों को पूछने योग्य अच्छे (क्रतुम्) बुद्धि वा कर्म्म को (नु) शीघ्र (प्रभरते) अच्छे प्रकार धारण करता (आक्षेति) अच्छे प्रकार निवासयुक्त करता, शरीर और आत्मा अन्तःकरण से (पुष्यति) बल को पुष्ट करता हुआ (तस्थौ) स्थित होता है ॥ १३ ॥
Essence
जो मनुष्य प्राणवायु की विद्या को जानकर उपयोग करते हैं, वे बलवान् प्रतिष्ठा को प्राप्त हो और दुःख तथा शत्रुओं को जीत कर उत्तम हाथी, घोड़े, मनुष्य, धन और बुद्धि से युक्त होके सदा सबको पुष्ट करते हैं ॥ १३ ॥
Subject
फिर वे उक्त वायु कैसे गुणवाले हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥