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Rigveda Mandal 1 / Sukta 64 / Mantra 10

191 Sukta
15 Mantra
1/64/10
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि॒श्ववे॑दसो र॒यिभिः॒ समो॑कसः॒ संमि॑श्लास॒स्तवि॑षीभिर्विर॒प्शिनः॑। अस्ता॑र॒ इषुं॑ दधिरे॒ गभ॑स्त्योरन॒न्तशु॑ष्मा॒ वृष॑खादयो॒ नरः॑ ॥

वि॒श्वऽवे॑दसः । र॒यिऽभिः॑ । सम्ऽओ॑कसः । सम्ऽमि॑श्लासः । तवि॑षीभिः । वि॒ऽर॒प्शिनः॑ । अस्ता॑रः । इषु॑म् । द॒धि॒रे॒ । गभ॑स्त्योः । अ॒न॒न्तऽशु॑ष्माः । वृष॑ऽखादयः । नरः॑ ॥

Mantra without Swara
विश्ववेदसो रयिभिः समोकसः संमिश्लासस्तविषीभिर्विरप्शिनः। अस्तार इषुं दधिरे गभस्त्योरनन्तशुष्मा वृषखादयो नरः ॥

विश्वऽवेदसः। रयिऽभिः। सम्ऽओकसः। सम्ऽमिश्लासः। तविषीभिः। विऽरप्शिनः। अस्तारः। इषुम्। दधिरे। गभस्त्योः। अनन्तऽशुष्माः। वृषऽखादयः। नरः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 7 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) विद्या को प्राप्त होनेवाले मनुष्यो ! तुम लोग जो (समोकसः) जिनसे अच्छे प्रकार निवास होता है (संमिश्लासः) अग्नि आदि चार तत्त्वों के साथ अत्यन्त मिले हुए (इषुम्) बाण वा इच्छा विशेष छोड़ते हुए (वृषखादयः) रसों को वर्षानेवाले पदार्थों के खानेवाले (अनन्तशुष्माः) अनन्त बलवान् (विरप्सिनः) बड़े (विश्ववेदसः) सब पदार्थों की प्राप्ति के हेतु होके सब पदार्थों को इधर-उधर चलानेवाले वायु (रयिभिः) चक्रवर्त्तिराज्य की शोभा आदि तथा (तविषीभिः) बल पराक्रम सेना आदि प्रजा और (गभस्त्योः) किरणयुक्त सूर्य्य वा प्रसिद्ध अग्नि के समान भुजाओं में बल को (दधिरे) धारण करते हैं, उनके गुणों को ठीक-ठीक जान कर उनसे विद्या, शिक्षा और यान के चलाने की क्रियाओं को ग्रहण करो ॥ १० ॥
Essence
मनुष्य लोग विद्वान् तथा वायु आदि पदार्थविद्या के विना परलोक और इस लोक के सुखों की सिद्धि कभी नहीं कर सकते ॥ १० ॥
Subject
फिर उक्त पवन किस प्रकार के गुणवाले हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥