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Rigveda Mandal 1 / Sukta 63 / Mantra 7

191 Sukta
9 Mantra
1/63/7
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- भुरिगार्षीपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं ह॒ त्यदि॑न्द्र स॒प्त युध्य॒न्पुरो॑ वज्रिन्पुरु॒कुत्सा॑य दर्दः। ब॒र्हिर्न यत्सु॒दासे॒ वृथा॒ वर्गं॒हो रा॑ज॒न्वरि॑वः पू॒रवे॑ कः ॥

त्वम् । ह॒ । त्यत् । इ॒न्द्र॒ । स॒प्त । युध्य॑न् । पुरः॑ । व॒ज्रि॒न् । पु॒रु॒ऽकुत्सा॑य । द॒र्द॒रिति॑ दर्दः । ब॒र्हिः । न । यत् । सु॒ऽदासे॑ । वृथा॑ । वर्क् । अं॒होः । रा॒ज॒न् । वरि॑वः । पू॒रवे॑ । कः ॥

Mantra without Swara
त्वं ह त्यदिन्द्र सप्त युध्यन्पुरो वज्रिन्पुरुकुत्साय दर्दः। बर्हिर्न यत्सुदासे वृथा वर्गंहो राजन्वरिवः पूरवे कः ॥

त्वम्। ह। त्यत्। इन्द्र। सप्त। युध्यन्। पुरः। वज्रिन्। पुरुऽकुत्साय। दर्दरिति दर्दः। बर्हिः। न। यत्। सुऽदासे। वृथा। वर्क्। अंहोः। राजन्। वरिवः। पूरवे। कः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 5 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वज्रिन्) उत्तम शस्त्रों से युक्त (राजन्) प्रकाश करने तथा (इन्द्र) विजय के देनेवाले सभा के अधिपति ! जो आपके (सप्त) सभा, सभासद्, सेना, सेनापति, भृत्य, प्रजा ये सात हैं, उन्हीं के साथ प्रेम से वर्त्तमान होके शत्रुओं के साथ (युध्यन्) युद्ध करते हुए जिस कारण तुम उन शत्रुओं के (पुरः) नगरों को (दर्दः) विदारण करते हो। जो आप (अंहोः) प्राप्त होने योग्य राज्य के (पुरुकुत्साय) बहुत मनुष्यों को ग्रहण करने योग्य (पूरवे) पूर्ण सुख के लिये (यत्) जो (वरिवः) सेवन करने योग्य पदार्थों को (सुदासे) उत्तम दान करनेवाले मनुष्यों से युक्त देश में (बर्हिः) अन्तरिक्ष के (न) समान (कः) करते हो (यत्) जो (वृथा) व्यर्थ काम करनेवाले मनुष्य हों (त्यत्) उनको (वर्क्) वर्जित करते हो, इस कारण हम सब लोगों को सत्कार करने योग्य हो ॥ ७ ॥
Essence
जैसे सूर्य्य सब जगत् के हित के लिये मेघ को वर्षाता है, वैसे ही सबका स्वामी सभापति सभों का हित सिद्ध करे ॥ ७ ॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में सभापति आदि के गुणों का उपदेश किया है ॥