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Rigveda Mandal 1 / Sukta 63 / Mantra 6

191 Sukta
9 Mantra
1/63/6
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- स्वराडार्षीबृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
त्वां ह॒ त्यदि॒न्द्रार्ण॑सातौ॒ स्व॑र्मीळ्हे॒ नर॑ आ॒जा ह॑वन्ते। तव॑ स्वधाव इ॒यमा स॑म॒र्य ऊ॒तिर्वाजे॑ष्वत॒साय्या॑ भूत् ॥

त्वाम् । ह॒ । त्यत् । इ॒न्द्र॒ । अर्ण॑ऽसातौ । स्वः॑ऽमीळ्हे । नरः॑ । आ॒जा । ह॒व॒न्ते॒ । तव॑ । स्व॒धा॒ऽवः । इ॒यम् । आ । स॒ऽम॒र्ये । ऊ॒तिः । वाजे॑षु । अ॒त॒साय्या॑ । भू॒त् ॥

Mantra without Swara
त्वां ह त्यदिन्द्रार्णसातौ स्वर्मीळ्हे नर आजा हवन्ते। तव स्वधाव इयमा समर्य ऊतिर्वाजेष्वतसाय्या भूत् ॥

त्वाम्। ह। त्यत्। इन्द्र। अर्णऽसातौ। स्वःऽमीळ्हे। नरः। आजा। हवन्ते। तव। स्वधाऽवः। इयम्। आ। सऽमर्ये। ऊतिः। वाजेषु। अतसाय्या। भूत् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्वधावः) उत्तम अन्न और (इन्द्र) श्रेष्ठ ऐश्वर्य के प्राप्त करानेवाले जगदीश्वर वा सभाध्यक्ष (नरः) राजनीति के जाननेवाले मनुष्य (त्यत्) उस (अर्णसातौ) विजय की प्राप्ति करानेवाले शूरवीर योद्धा, मनुष्यों का सेवन हो, जिस (स्वर्मीढे) सुख के सींचने से युक्त (आजौ) संग्राम में (त्वाम्) आपको (ह) निश्चय करके (आहवन्ते) पुकारते हैं। जिस कारण (तव) आपकी जो (इयम्) यह (समर्य्ये) संग्राम वा (वाजेषु) विज्ञान, अन्न और सेनादिकों में (अतसाय्या) निरन्तर सुखों की प्राप्ति करानेवाले (ऊतिः) रक्षण आदि क्रिया है, वह हम लोगों को प्राप्त (भूत्) होवे ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि सब धर्मसम्बन्धी कार्य्यों में ईश्वर वा सभाध्यक्ष का सहाय लेके सम्पूर्ण कार्यों को सिद्ध करें ॥ ६ ॥
Subject
फिर मनुष्यों को ईश्वर और सभापति आदि के सहाय की इच्छा कहाँ-कहाँ करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥