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Rigveda Mandal 1 / Sukta 63 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/63/5
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वं ह॒ त्यदि॒न्द्रारि॑षण्यन्दृ॒ळ्हस्य॑ चि॒न्मर्ता॑ना॒मजु॑ष्टौ। व्य१॒॑स्मदा काष्ठा॒ अर्व॑ते वर्घ॒नेव॑ वज्रिञ्छ्नथिह्य॒मित्रा॑न् ॥

त्वम् । ह॒ । त्यत् । इ॒न्द्र॒ । अरि॑षण्यन् । दृ॒ळ्हस्य॑ । चि॒त् । मर्ता॑नाम् । अजु॑ष्टौ । वि । अ॒स्मत् । आ । काष्ठाः॑ । अर्व॑ते । वः॒ । घ॒नाऽइ॑व । व॒ज्रि॒न् । श्न॒थि॒हि॒ । अ॒मित्रा॑न् ॥

Mantra without Swara
त्वं ह त्यदिन्द्रारिषण्यन्दृळ्हस्य चिन्मर्तानामजुष्टौ। व्य१स्मदा काष्ठा अर्वते वर्घनेव वज्रिञ्छ्नथिह्यमित्रान् ॥

त्वम्। ह। त्यत्। इन्द्र। अरिषण्यन्। दृळ्हस्य। चित्। मर्तानाम्। अजुष्टौ। वि। अस्मत्। आ। काष्ठाः। अर्वते। वः। घनाऽइव। वज्रिन्। श्नथिहि। अमित्रान् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 4 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अरिषण्यन्) अपने शरीर से हिंसा अधर्म्म की इच्छा नहीं करनेवाले (वज्रिन्) उत्तम आयुधों से युक्त (इन्द्र) सभापते ! (त्वम्) आप (ह) प्रसिद्ध (अस्मत्) हम लोगों से (अर्वते) घोड़े आदि धनों से युक्त सेना के लिये (व्यावः) अनेक प्रकार स्वीकार करते हो (त्यत्) उस (दृढस्य) स्थिर राज्य (चित्) और (मर्त्तानाम्) प्रजा के मनुष्यों को शत्रुओं की (अजुष्टौ) अप्रीति होने में (घनेव) जैसे सूर्य मेघों को काटता (अमित्रान्) धर्म्मविरोधी शत्रुओं को (काष्ठाः) दिशाओं के प्रति (श्नथिहि) मारो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सभा सभापति आदि को उचित है कि राज्य तथा सेना में प्रीति उत्पन्न और शत्रुओं में द्वेष करके जैसे सूर्य मेघों का नित्य छेदन करता है, वैसे दुष्ट शत्रुओं का सदैव छेदन किया करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह उक्त सभाध्यक्ष कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥