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Rigveda Mandal 1 / Sukta 63 / Mantra 3

191 Sukta
9 Mantra
1/63/3
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं स॒त्य इ॑न्द्र धृ॒ष्णुरे॒तान्त्वमृ॑भु॒क्षा नर्य॒स्त्वं षाट्। त्वं शुष्णं॑ वृ॒जने॑ पृ॒क्ष आ॒णौ यूने॒ कुत्सा॑य द्यु॒मते॒ सचा॑हन् ॥

त्वम् । स॒त्यः । इ॒न्द्र॒ । धृ॒ष्णुः । ए॒तान् । त्वम् । ऋ॒भु॒क्षाः । नर्यः॑ । त्वम् । षाट् । त्वम् । शुष्ण॑म् वृ॒जने॑ । पृ॒क्षे । आ॒णौ । यूने॑ । कुत्सा॑य । द्यु॒मते॑ । सचा॑ । अ॒ह॒न् ॥

Mantra without Swara
त्वं सत्य इन्द्र धृष्णुरेतान्त्वमृभुक्षा नर्यस्त्वं षाट्। त्वं शुष्णं वृजने पृक्ष आणौ यूने कुत्साय द्युमते सचाहन् ॥

त्वम्। सत्यः। इन्द्र। धृष्णुः। एतान्। त्वम्। ऋभुक्षाः। नर्यः। त्वम्। षाट्। त्वम्। शुष्णम् वृजने। पृक्षे। आणौ। यूने। कुत्साय। द्युमते। सचा। अहन् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 4 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) उत्तम सम्पदा के देनेवाले सभाध्यक्ष ! (त्वम्) आप जिस कारण (सत्यः) जीवस्वरूप से अनादि हो, जिस कारण (त्वम्) आप (धृष्णुः) दृढ़ हो तथा जिस कारण (त्वम्) आप (ऋभुक्षाः) गुणों से बड़े (नर्य्यः) मनुष्यों के बीच चतुर और (षाट्) सहनशील हो, इससे (वृजने) जिसमें शत्रुओं को प्राप्त होते हैं (पृक्षे) संयुक्त इकट्ठे होते हैं, जिसमें उस (आणौ) संग्राम में (सचा) शिष्टों के सम्बन्ध से (कुत्साय) शस्त्रों को धारण किये (द्युमते) उत्तम प्रकाशयुक्त (यूने) शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त हुए मनुष्य के लिये (शुष्णम्) पूर्ण बल को देते हो। जिस कारण आप शत्रुओं को (अहन्) मारते तथा (एतान्) इन धर्मात्मा श्रेष्ठ पुरुषों का पालन करते हो, इससे पूजने योग्य हो ॥ ३ ॥
Essence
सभा और सभापति के विना शत्रुओं का पराजय और राज्य का पालन किसी से नहीं हो सकता। इसलिये श्रेष्ठ गुणवालों की सभा और सभापति से इन सब कार्य्यों को सिद्ध कराना मनुष्यों का मुख्य काम है ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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