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Rigveda Mandal 1 / Sukta 63 / Mantra 2

191 Sukta
9 Mantra
1/63/2
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ यद्धरी॑ इन्द्र॒ विव्र॑ता॒ वेरा ते॒ वज्रं॑ जरि॒ता बा॒ह्वोर्धा॑त्। येना॑विहर्यतक्रतो अ॒मित्रा॒न्पुर॑ इ॒ष्णासि॑ पुरुहूत पू॒र्वीः ॥

आ । यत् । हरी॒ इति॑ । इ॒न्द्र॒ । विऽव्र॑ता । वेः । आ । ते॒ । वज्र॑म् । ज॒रि॒ता । बा॒ह्वोः । धा॒त् । येन॑ । अ॒वि॒ह॒र्य॒त॒क्र॒तो॒ इत्य॑विहर्यतऽक्रतो । अ॒मित्रा॑न् । पुरः॑ । इ॒ष्णासि॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । पू॒र्वीः ॥

Mantra without Swara
आ यद्धरी इन्द्र विव्रता वेरा ते वज्रं जरिता बाह्वोर्धात्। येनाविहर्यतक्रतो अमित्रान्पुर इष्णासि पुरुहूत पूर्वीः ॥

आ। यत्। हरी इति। इन्द्र। विऽव्रता। वेः। आ। ते। वज्रम्। जरिता। बाह्वोः। धात्। येन। अविहर्यतक्रतो इत्यविहर्यतऽक्रतो। अमित्रान्। पुरः। इष्णासि। पुरुऽहूत। पूर्वीः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 4 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अविहर्य्यक्रतो) दुष्ट बुद्धि और पाप कर्मों से रहित (पुरुहूत) बहुत विद्वानों से सत्कार को प्राप्त करानेवाले सभाद्यध्यक्ष ! आप (यत्) जिस कारण (विव्रता) नाना प्रकार के नियमों के उत्पन्न करनेवाले (हरी) सेना और न्यायप्रकाश को (आवेः) अच्छे प्रकार जानते हो (येन) जिस वज्र से (अमित्रान्) शत्रुओं को मारते तथा जिससे उनके (पूर्वीः) बहुत (पुरः) नगरों को (इष्णासि) जीतने के लिये इच्छा करते और शत्रुओं के पराजय और अपने विजय के लिये प्रतिक्षण जाते हो, इससे (जरिता) सब विद्याओं की स्तुति करनेवाला मनुष्य (ते) आपके (बाह्वोः) भुजाओं के बल के आश्रय से (वज्रम्) वज्र को (आधात्) धारण करता है ॥ २ ॥
Essence
सभापति आदि को उचित है कि इस प्रकार के उत्तम स्वभाव, गुण और कर्मों को स्वीकार करें कि जिससे सब मनुष्य इस कर्म को देख तथा शिष्ट होकर निष्कण्टक राज्य के सुख को सदा भोगें ॥ २ ॥
Subject
अब अगले मन्त्र में सभापति आदि के गुणों का उपदेश किया है ॥