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Rigveda Mandal 1 / Sukta 62 / Mantra 8

191 Sukta
13 Mantra
1/62/8
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- भुरिगार्षीपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स॒नाद्दिवं॒ परि॒ भूमा॒ विरू॑पे पुन॒र्भुवा॑ युव॒ती स्वेभि॒रेवैः॑। कृ॒ष्णेभि॑र॒क्तोषा रुश॑द्भि॒र्वपु॑र्भि॒रा च॑रतो अ॒न्यान्या॑ ॥

स॒नात् । दिव॑म् । परि॑ । भूम॑ । विरू॑पे॒ इति॒ विऽरू॑पे । पु॒नः॒ऽभुवा॑ । यु॒व॒ती इति॑ । स्वेभिः॑ । एवैः॑ । कृ॒ष्णेभिः॑ । अ॒क्ता । उ॒षाः । रुश॑त्ऽभिः । वपुः॑ऽभिः । आ । च॒र॒तः॒ । अ॒न्याऽअ॑न्या ॥

Mantra without Swara
सनाद्दिवं परि भूमा विरूपे पुनर्भुवा युवती स्वेभिरेवैः। कृष्णेभिरक्तोषा रुशद्भिर्वपुर्भिरा चरतो अन्यान्या ॥

सनात्। दिवम्। परि। भूम। विरूपे इति विऽरूपे। पुनःऽभुवा। युवती इति। स्वेभिः। एवैः। कृष्णेभिः। अक्ता। उषाः। रुशत्ऽभिः। वपुःऽभिः। आ। चरतः। अन्याऽअन्या ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्री-पुरुषो ! तुम जैसे (सनात्) सनातन कारण से (दिवम्) सूर्य्य प्रकाश और (भूमा) भूमि को प्राप्त होकर (पुनर्भुवा) वार-वार पर्य्याय से उत्पन्न होके (युवती) युवावस्था को प्राप्त हुए स्त्री-पुरुष के समान (विरूपे) विविध रूप से युक्त (अक्ता) रात्रि (उषाः) दिन (स्वेभिः) क्षण आदि अवयव (रुशद्भिः) प्राप्ति के हेतु रूपादि गुणों के साथ (वपुर्भिः) अपनी आकृति आदि शरीर वा (कृष्णेभिः) परस्पर आकर्षणादि को (एवैः) प्राप्त करनेवाले गुणों के साथ (अन्यान्या) भिन्न-भिन्न परस्पर मिले हुए (पर्य्याचरतः) जाते-आते हैं, वैसे स्वयंवर अर्थात् परस्पर की प्रसन्नता से विवाह करके एक-दूसरे के साथ प्रीतियुक्त होके सदा आनन्द में वर्त्तें ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जैसे चक्र के समान सर्वदा वर्त्तमान रात्रि-दिन परस्पर संयुक्त वर्त्तते हैं, वैसे विवाहित स्त्री-पुरुष अत्यन्त प्रेम के साथ वर्त्ता करें ॥ ८ ॥
Subject
अब रात्रि और दिन के दृष्टान्त से स्त्री और पुरुष किस-किस प्रकार वर्त्तमान करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥