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Rigveda Mandal 1 / Sukta 62 / Mantra 7

191 Sukta
13 Mantra
1/62/7
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- भुरिगार्षीपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
द्वि॒ता वि व॑व्रे स॒नजा॒ सनी॑ळे अ॒यास्यः॒ स्तव॑मानेभिर॒र्कैः। भगो॒ न मेने॑ पर॒मे व्यो॑म॒न्नधा॑रय॒द्रोद॑सी सु॒दंसाः॑ ॥

द्वि॒ता । वि । व॒व्रे॒ । स॒ऽनजा॑ । सनी॑ळे॒ इति॒ सऽनी॑ळे । अ॒यास्यः॑ । स्तव॑मानेभिः । अ॒र्कैः । भगः॑ । न । मेने॒ इति॑ । प॒र॒मे । विऽओ॑मन् । अधा॑रयत् । रोद॑सी॒ इति॑ । सु॒ऽदंसाः॑ ॥

Mantra without Swara
द्विता वि वव्रे सनजा सनीळे अयास्यः स्तवमानेभिरर्कैः। भगो न मेने परमे व्योमन्नधारयद्रोदसी सुदंसाः ॥

द्विता। वि। वव्रे। सऽनजा। सनीळे इति सऽनीळे। अयास्यः। स्तवमानेभिः। अर्कैः। भगः। न। मेने इति। परमे। विऽओमन्। अधारयत्। रोदसी इति। सुऽदंसाः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे विद्वानों से जो (सनीडे) समीप (स्तवमानेभिः) स्तुतियुक्त (अर्कैः) स्तोत्रों से (सनजा) सनातन कारण से उत्पन्न हुई (द्विता) दो अर्थात् प्रजा और सभाध्यक्ष को (विवव्रे) विशेष करके स्वीकार किया जाता है, वैसे मनुष्य (अयास्यः) अनायास से सिद्ध करनेवाला (सुदंसाः) उत्तम कर्मयुक्त मैं जैसे (परमे) (व्योमन्) उत्तम अन्तरिक्ष में (रोदसी) प्रकाश और भूमि को (भगो न) सूर्य्य के समान विद्वान् (मेने) मानता और (अधारयत्) धारण करता है, वैसे इसको धारण करता और मानता हूँ ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सभा आदि का अध्यक्ष ऐश्वर्य को और जैसे सूर्य प्रकाश तथा पृथिवी को धारण करता है, वैसे ही न्याय और विद्या को धारण करें ॥ ७ ॥
Subject
फिर सभाध्यक्ष कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥