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Rigveda Mandal 1 / Sukta 62 / Mantra 5

191 Sukta
13 Mantra
1/62/5
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृदार्षीत्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
गृ॒णा॒नो अङ्गि॑रोभिर्दस्म॒ वि व॑रु॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ गोभि॒रन्धः॑। वि भूम्या॑ अप्रथय इन्द्र॒ सानु॑ दि॒वो रज॒ उप॑रमस्तभायः ॥

गृ॒णा॒नः । अङ्गि॑रःऽभिः । द॒स्म॒ । वि । वः॒ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । गोभिः॑ । अन्धः॑ । वि । भूम्याः॑ । अ॒प्र॒थ॒यः॒ । इ॒न्द्र॒ । सानु॑ । दि॒वः । रजः॑ । उप॑रम् । अ॒स्त॒भा॒यः॒ ॥

Mantra without Swara
गृणानो अङ्गिरोभिर्दस्म वि वरुषसा सूर्येण गोभिरन्धः। वि भूम्या अप्रथय इन्द्र सानु दिवो रज उपरमस्तभायः ॥

गृणानः। अङ्गिरःऽभिः। दस्म। वि। वः। उषसा। सूर्येण। गोभिः। अन्धः। वि। भूम्याः। अप्रथयः। इन्द्र। सानु। दिवः। रजः। उपरम्। अस्तभायः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) शत्रुओं के (दस्म) नाश करनेवाले सभाध्यक्ष ! (गृणानः) उपदेश करते हुए आप जैसे बिजुली (अङ्गिरोभिः) प्राण (उषसा) प्रातःकाल के (सूर्येण) सूर्य के प्रकाश तथा (गोभिः) किरणों से (अन्धः) अन्न को प्रकट करती है, वैसे धर्मराज्य और सेना को (विवः) प्रकट करो वैसे बिजुली को (व्यप्रथयः) विविधप्रकार से विस्तृत कीजिये। जैसे सूर्य (भूम्याः) पृथिवी में श्रेष्ठ (दिवः) प्रकाश के (सानु) ऊपरले भाग (रजः) सब लोकों और (उपरम्) मेघ को (अस्तभायः) संयुक्त करता है, वैसे धर्मयुक्त राज्य की सेना को विस्तारयुक्त कीजिये और शत्रुओं को बन्धन करते हुए आप हम सब लोगों से स्तुति करने के योग्य हो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को प्रातःकाल सूर्य के किरण और प्राणों के समान उक्त गुणों का प्रकाश करके दुष्टों का निवारण करना चाहिये। जैसे सूर्य प्रकाश को फैला और मेघ को उत्पन्न कर वर्षाता है, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि मनुष्यों को प्रजा में उत्तम विद्या उत्पन्न करके सुखों की वर्षा करनी चाहिये ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥