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Rigveda Mandal 1 / Sukta 62 / Mantra 3

191 Sukta
13 Mantra
1/62/3
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- भुरिगार्षीपङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इन्द्र॒स्याङ्गि॑रसां चे॒ष्टौ वि॒दत्स॒रमा॒ तन॑याय धा॒सिम्। बृह॒स्पति॑र्भि॒नदद्रिं॑ विद॒द्गाः समु॒स्रिया॑भिर्वावशन्त॒ नरः॑ ॥

इन्द्र॑स्य । अङ्गि॑रसाम् । च॒ । इ॒ष्टौ । वि॒दत् । स॒रमा॑ । तन॑याय । धा॒सिम् । बृह॒स्पतिः॑ । भि॒नत् । अद्रि॑म् । वि॒दत् । गाः । सम् । उ॒स्रिया॑भिः । वा॒व॒श॒न्त॒ । नरः॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्याङ्गिरसां चेष्टौ विदत्सरमा तनयाय धासिम्। बृहस्पतिर्भिनदद्रिं विदद्गाः समुस्रियाभिर्वावशन्त नरः ॥

इन्द्रस्य। अङ्गिरसाम्। च। इष्टौ। विदत्। सरमा। तनयाय। धासिम्। बृहस्पतिः। भिनत्। अद्रिम्। विदत्। गाः। सम्। उस्रियाभिः। वावशन्त। नरः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) सुखों को प्राप्त करानेवाले मनुष्यो ! जैसे (सरमा) विद्या धर्मादिबोधों को उत्पन्न करनेवाली माता (तनयाय) पुत्र के लिये (धासिम्) अन्न आदि अच्छे पदार्थों को (विदत्) प्राप्त करती है, जैसे (बृहस्पतिः) बड़े-बड़े पदार्थों को रक्षा करनेवाला सभाध्यक्ष जैसे सूर्य (उस्रियाभिः) किरणों से (अद्रिम्) मेघ को (भिनत्) विदारण और जैसे (गाः) सुशिक्षित वाणियों को (विदत्) प्राप्त करता है, वैसे तुम भी (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवाले परमेश्वर, सभाध्यक्ष वा सूर्य (च) और (अङ्गिरसाम्) विद्या, धर्म और राज्यवाले विद्वानों की (इष्टौ) इष्ट की सिद्ध करनेवाली नीति में विद्यादि उत्तम गुणों का (संवावशन्त) अच्छे प्रकार वार-वार प्रकाश करो, जिससे सब संसार में अविद्यादि दुष्ट गुण नष्ट हों ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि माता के समान प्रजा में वर्त्त कर, सूर्य के समान विद्यादि उत्तम गुणों का प्रकाश कर, ईश्वर की कही वा विद्वानों से अनुष्ठान की हुई नीति में स्थित हो और सबके उपकार को करते हुए विद्यादि सद्गुणों के आनन्द में सदा मग्न रहें ॥ ३ ॥
Subject
फिर मनुष्यों को पूर्वोक्त कृत्य किसलिये करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥