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Rigveda Mandal 1 / Sukta 62 / Mantra 2

191 Sukta
13 Mantra
1/62/2
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृदार्षीत्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र वो॑ म॒हे महि॒ नमो॑ भरध्वमाङ्गू॒ष्यं॑ शवसा॒नाय॒ साम॑। येना॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ पद॒ज्ञा अर्च॑न्तो॒ अङ्गि॑रसो॒ गा अवि॑न्दन् ॥

प्र । वः॒ । म॒हे । महि॑ । नमः॑ । भ॒र॒ध्व॒म् । आ॒ङ्गू॒ष्य॑म् । श॒व॒सा॒नाय॑ । साम॑ । येन॑ । नः॒ । पूर्वे॑ । पि॒तरः॑ । प॒द॒ऽज्ञाः । अर्च॑न्तः । अङ्गि॑रसः । गाः । अवि॑न्दन् ॥

Mantra without Swara
प्र वो महे महि नमो भरध्वमाङ्गूष्यं शवसानाय साम। येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञा अर्चन्तो अङ्गिरसो गा अविन्दन् ॥

प्र। वः। महे। महि। नमः। भरध्वम्। आङ्गूष्यम्। शवसानाय। साम। येन। नः। पूर्वे। पितरः। पदऽज्ञाः। अर्चन्तः। अङ्गिरसः। गाः। अविन्दन् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (वः) तुम वा (नः) हम लोगों को (अङ्गिरसः) प्राणादि विद्या और (पदज्ञाः) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जाननेवाले (महे) बड़े (शवसानाय) ज्ञान बलयुक्त सभाध्यक्ष के लिये (महि) बहुत (साम) दुःखनाश करनेवाले (आङ्गूष्यम्) विज्ञानयुक्त (नमः) नमस्कार वा अन्न का (अर्चन्तः) सत्कार करते हुए (पूर्वे) पहिले सब विद्याओं को पढ़ते हुए (पितरः) विद्यादि सद्गुणों से रक्षा करनेवाले विद्वान् लोग (येन) जिस विज्ञान वा कर्म से (गाः) विद्या प्रकाशयुक्त वाणियों को (अविन्दन्) प्राप्त हों, उनका तुम लोग (प्रभरध्वम्) भरण-पोषण सदा किया करो ॥ २ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् लोग जिन वेद, सृष्टिक्रम और प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कहे हुए धर्मयुक्त मार्ग से चलते हुए सब प्रकार परमेश्वर का पूजन करके सबके हित को धारण करते हैं, वैसे ही तुम लोग भी करो ॥ २ ॥
Subject
फिर मनुष्यों को इस विषय में क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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