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Rigveda Mandal 1 / Sukta 62 / Mantra 11

191 Sukta
13 Mantra
1/62/11
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- आर्षीत्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒ना॒युवो॒ नम॑सा॒ नव्यो॑ अ॒र्कैर्व॑सू॒यवो॑ म॒तयो॑ दस्म दद्रुः। पतिं॒ न पत्नी॑रुश॒तीरु॒शन्तं॑ स्पृ॒शन्ति॑ त्वा शवसावन्मनी॒षाः ॥

स॒ना॒ऽयुवः॑ । नम॑सा । नव्यः॑ । अ॒र्कैः । व॒सु॒ऽयवः॑ । म॒तयः॑ । द॒स्म॒ । द॒द्रुः॒ । पति॑म् । न । पत्नीः॑ । उ॒श॒तीः । उ॒शन्त॑म् । स्पृ॒शन्ति॑ । त्वा॒ । श॒व॒सा॒ऽव॒न् । म॒नी॒षाः ॥

Mantra without Swara
सनायुवो नमसा नव्यो अर्कैर्वसूयवो मतयो दस्म दद्रुः। पतिं न पत्नीरुशतीरुशन्तं स्पृशन्ति त्वा शवसावन्मनीषाः ॥

सनाऽयुवः। नमसा। नव्यः। अर्कैः। वसुऽयवः। मतयः। दस्म। दद्रुः। पतिम्। न। पत्नीः। उशतीः। उशन्तम्। स्पृशन्ति। त्वा। शवसाऽवन्। मनीषाः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शवसावन्) बलयुक्त (दस्म) अविद्यान्धकारविनाशक सभापते ! तू जैसे (सनायुवः) सनातन कर्म के करनेवालों के समान आचरण करते (नमसा) अन्न वा नमस्कार तथा (अर्कैः) मन्त्र अर्थात् विचारों के साथ वर्त्तमान (वसूयवः) अपने लिये विद्या, धनों और (मनीषाः) विज्ञानों के इच्छा करने (मतयः) सबको जाननेवाले विद्वान् लोग (न) जैसे (नव्यः) नवीन (उशतीः) काम की चेष्टा से युक्त (पत्नीः) स्त्री (उशन्तम्) काम की इच्छा करनेवाले (पतिम्) पति का (स्पृशन्ति) आलिङ्गन करती हैं और जैसे (दद्रुः) कुटिल गति को प्राप्त होनेवालों को जानते हैं, वैसे (त्वा) तुझको प्रजा सेवें ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को समझना चाहिये कि जैसे स्त्री-पुरुषों के साथ वर्त्तमान होने से सन्तानों की उत्पत्ति होती है, वैसे ही रात-दिनों के एक-साथ वर्तमान होने से सब व्यवहार सिद्ध होते हैं। और जैसे सूर्य का प्रकाश और पृथिवी की छाया के विना रात और दिन का सम्भव नहीं होता, वैसे ही स्त्री-पुरुष के विना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती ॥ ११ ॥
Subject
फिर भी दिन और रात्रि कैसे तथा इनके जाननेवाले विद्वान् लोग कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥