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Rigveda Mandal 1 / Sukta 62 / Mantra 10

191 Sukta
13 Mantra
1/62/10
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- आर्षीत्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒नात्सनी॑ळा अ॒वनी॑रवा॒ता व्र॒ता र॑क्षन्ते अ॒मृताः॒ सहो॑भिः। पु॒रू स॒हस्रा॒ जन॑यो॒ न पत्नी॑र्दुव॒स्यन्ति॒ स्वसा॑रो॒ अह्र॑याणम् ॥

स॒नात् । सऽनी॑ळाः । अ॒वनीः॑ । अ॒वा॒ताः । व्र॒ता । र॒क्ष॒न्ते॒ । अ॒मृताः॑ । सहः॑ऽभिः । पु॒रु । स॒हस्रा॑ । जन॑यः । न । पत्नीः॑ । दु॒व॒स्यन्ति॑ । स्वसा॑रः । अह्र॑याणम् ॥

Mantra without Swara
सनात्सनीळा अवनीरवाता व्रता रक्षन्ते अमृताः सहोभिः। पुरू सहस्रा जनयो न पत्नीर्दुवस्यन्ति स्वसारो अह्रयाणम् ॥

सनात्। सऽनीळाः। अवनीः। अवाताः। व्रता। रक्षन्ते। अमृताः। सहःऽभिः। पुरु। सहस्रा। जनयः। न। पत्नीः। दुवस्यन्ति। स्वसारः। अह्रयाणम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 5 Varga » 2 Mantra » 5

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Meaning
जैसे (अवाताः) हिंसारहित (अवनीः) भूमि सबकी रक्षा करती है (पुरुसहस्रा) बहुत हजारह (जनयः) उत्पन्न करनेहारे पति (पत्नीः) (न) जैसे अपनी स्त्रियों की रक्षा करते हैं, वैसे (सनीडाः) समीप में वर्त्तमान (अमृताः) नाशरहित विद्वान् लोग (सहोभिः) विद्या योग धर्मवालों से (सनात्) सनातन (व्रता) सत्य धर्म के आचरणों की (रक्षन्ते) रक्षा करते हैं, और जैसे (स्वसारः) बहिनें (अह्रयाणम्) लज्जा को अप्राप्त अपने भाई की (दुवस्यन्ति) सेवा करती हैं, वैसे विद्या और धर्म ही को सेवते हैं, वे मुक्ति को प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे पति लोग अपनी स्त्रियों, बहिनों और भाइयों तथा विद्यार्थी लोग आचार्य्यों की सेवा से सुख और विद्याओं को प्राप्त होते हैं, वैसे धर्मात्मा विद्वान् स्त्री-पुरुष लोग घर में बसते हुए मुक्ति को प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
Subject
फिर वे कैसे हों, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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