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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 9

191 Sukta
16 Mantra
1/61/9
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्येदे॒व प्र रि॑रिचे महि॒त्वं दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्य॒न्तरि॑क्षात्। स्व॒राळिन्द्रो॒ दम॒ आ वि॒श्वगू॑र्तः स्व॒रिरम॑त्रो ववक्षे॒ रणा॑य ॥

अ॒स्य । इत् । ए॒व । प्र । रि॒रि॒चे॒ । म॒हि॒त्वम् । दि॒वः । पृ॒थि॒व्याः । परि॑ । अ॒न्तरि॑क्षात् । स्व॒ऽराट् । इन्द्रः॑ । दमे॑ । आ । वि॒श्वऽगू॑र्तः । सु॒ऽअ॒रिः । अम॑त्रः । व॒व॒क्षे॒ । रणा॑य ॥

Mantra without Swara
अस्येदेव प्र रिरिचे महित्वं दिवस्पृथिव्याः पर्यन्तरिक्षात्। स्वराळिन्द्रो दम आ विश्वगूर्तः स्वरिरमत्रो ववक्षे रणाय ॥

अस्य। इत्। एव। प्र। रिरिचे। महित्वम्। दिवः। पृथिव्याः। परि। अन्तरिक्षात्। स्वऽराट्। इन्द्रः। दमे। आ। विश्वऽगूर्तः। सुऽअरिः। अमत्रः। ववक्षे। रणाय ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 28 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (विश्वगूर्त्तः) सब भोज्य वस्तुओं को भक्षण करने (स्वरिः) उत्तम शत्रुओं (अमत्रः) ज्ञानवान् वा ज्ञान का हेतु (स्वराट्) अपने आप प्रकाश सहित (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त सूर्य वा सभाध्यक्ष (दमे) उत्तम घर वा संसार में (रणाय) संग्राम के लिये (आववक्षे) रोष वा अच्छे प्रकार घात करता है वा जिस की (दिवः) प्रकाश (पृथिव्याः) भूमि और (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष से (इत्) भी (परि) सब प्रकार (महित्वम्) पूज्य वा महागुणविशिष्ट महिमा (प्र रिरिचे) विशेष हैं, उस (अस्य) इस सूर्य वा सभाध्यक्ष का (एव) ही कार्यों में उपयोग वा सभा आदि में अधिकार देना चाहिये ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे सूर्य, पृथिव्यादिकों से गुण वा परिमाण के द्वारा अधिक है, वैसे ही उत्तम गुण युक्त सभा आदि के अधिपति राजा को अधिकार देकर सब कार्यों की सिद्धि करनी चाहिये ॥ ९ ॥
Subject
अब सूर्य सभाध्यक्ष कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥