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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 8

191 Sukta
16 Mantra
1/61/8
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒स्मा इदु॒ ग्नाश्चि॑द्दे॒वप॑त्नी॒रिन्द्रा॑या॒र्कम॑हि॒हत्य॑ ऊवुः। परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी ज॑भ्र उ॒र्वी नास्य॒ ते म॑हि॒मानं॒ परि॑ ष्टः ॥

अ॒स्मै । इत् । ऊँ॒ इति॑ । ग्नाः । चि॒त् । दे॒वऽप॑त्नीः । इन्द्रा॑य । अ॒र्कम् । अ॒हि॒ऽहत्ये॑ । ऊ॒वु॒रित्यू॑वुः । परि॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । ज॑भ्रे॒ । उ॒र्वी इति॑ । न । अ॒स्य॒ । ते इति॑ । म॒हि॒मान॑म् । परि॑ । स्त॒ इति॑ स्तः ॥

Mantra without Swara
अस्मा इदु ग्नाश्चिद्देवपत्नीरिन्द्रायार्कमहिहत्य ऊवुः। परि द्यावापृथिवी जभ्र उर्वी नास्य ते महिमानं परि ष्टः ॥

अस्मै। इत्। ऊँ इति। ग्नाः। चित्। देवऽपत्नीः। इन्द्राय। अर्कम्। अहिऽहत्ये। ऊवुरित्यूवुः। परि। द्यावापृथिवी इति। जभ्रे। उर्वी इति। न। अस्य। ते इति। महिमानम्। परि। स्त इति स्तः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 28 Mantra » 3

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Meaning
हे सभापति ! जैसे यह सूर्य्य (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि को (जभ्रे) धारण करता वा जिसके वश में (उर्वी) बहुधा रूपप्रकाशयुक्त पृथिवी है (अस्य) जिस इस सभाध्यक्ष के (अहिहत्ये) मेघों के हनन व्यवहार में (चित्) प्रकाश भूमि की (महिमानम्) महिमा के (न) (परि स्तः) सब प्रकार छेदन को समर्थ नहीं हो सकते, वैसे उस (अस्मै) इस (इन्द्राय) ऐश्वर्य प्राप्त करनेवाले सभाध्यक्ष के लिये (इदु) ही (देवपत्नीः) विद्वानों से पालनीय पतिव्रता स्त्रियों के सदृश (ग्नाः) वेदवाणी (अर्कम्) दिव्यगुणुसम्पन्न अर्चनीय वीर पुरुष को (पर्यूवुः) सब प्रकार तन्तुओं के समान विस्तृत करती हैं, वही राज्य करने के योग्य होता है ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य के प्रताप और महत्त्व के आगे पृथिवी आदि लोकों की गणना स्वल्प है, वैसे ही पूर्ण विद्यावाले पुरुष के महिमा के आगे मूर्ख की गणना तुच्छ है ॥ ८ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

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