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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 7

191 Sukta
16 Mantra
1/61/7
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्येदु॑ मा॒तुः सव॑नेषु स॒द्यो म॒हः पि॒तुं प॑पि॒वाञ्चार्वन्ना॑। मु॒षा॒यद्विष्णुः॑ पच॒तं सही॑या॒न्विध्य॑द्वरा॒हं ति॒रो अद्रि॒मस्ता॑ ॥

अ॒स्य । इत् । ऊँ॒ इति॑ । मा॒तुः । सव॑नेषु । स॒द्यः । म॒हः । पि॒तुम् । प॒पि॒वान् । चारु॑ । अन्ना॑ । मु॒षा॒यत् । विष्णुः॑ । प॒च॒तम् । सही॑यान् । विध्य॑त् । व॒रा॒हम् । ति॒रः । अद्रि॑म् । अस्ता॑ ॥

Mantra without Swara
अस्येदु मातुः सवनेषु सद्यो महः पितुं पपिवाञ्चार्वन्ना। मुषायद्विष्णुः पचतं सहीयान्विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता ॥

अस्य। इत्। ऊँ इति। मातुः। सवनेषु। सद्यः। महः। पितुम्। पपिवान्। चारु। अन्ना। मुषायत्। विष्णुः। पचतम्। सहीयान्। विध्यत्। वराहम्। तिरः। अद्रिम्। अस्ता ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 28 Mantra » 2

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Meaning
जो (अस्य) इस (मातुः) शत्रु और अपने बल का परिमाण करनेवाले सभाध्यक्ष के (सवनेषु) ऐश्वर्यों में (महः) बड़े (पचतम्) परिपक्व (चारु) सुन्दर (पितुम्) संस्कार किये हुए अन्न को (पपिवान्) खाने-पीने तथा (सहीयान्) अतिशय करके सहन करनेवाला वीर मनुष्य (अन्ना) अन्नों को (अस्ता) प्रक्षेपण करने (मुषायत्) अपने को चोर की इच्छा करते हुए के तुल्य (विष्णुः) सब विद्याओं के अङ्गों में व्यापक (अद्रिम्) पर्वताकार (वराहम्) मेघ को (तिरः) नीचे (विध्यत्) गिराते हुए सूर्य के समान शत्रुओं को (सद्यः) शीघ्र नष्ट करे (इदु) वही मनुष्य सेनाध्यक्ष होने के योग्य होता है ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्न-जल के रसों को चोर के समान हरता वा रक्षा करता हुआ, अपने किरणों से मेघ को हनन कर प्रकट करता हुआ, छिन्न-भिन्न कर अपने विजय को प्राप्त होता है, वैसे ही सेना आदि के अध्यक्ष के सेना आदि ऐश्वर्यों में स्थित हुए शूरवीर पुरुष शत्रुओं का पराजय करें ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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