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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 6

191 Sukta
16 Mantra
1/61/6
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒स्मा इदु॒ त्वष्टा॑ तक्ष॒द्वज्रं॒ स्वप॑स्तमं स्व॒र्यं१॒॑ रणा॑य। वृ॒त्रस्य॑ चिद्वि॒दद्येन॒ मर्म॑ तु॒जन्नीशा॑नस्तुज॒ता कि॑ये॒धाः ॥

अ॒स्मै । इत् । ऊँ॒ इति॑ । त्वष्टा॑ । त॒क्ष॒त् । वज्र॑म् । स्वपः॑ऽतमम् । स्व॒र्य॑म् । रणा॑य । वृ॒त्रस्य॑ । चि॒त् । वि॒दत् । येन॑ । मर्म॑ । तु॒जन् । ईशा॑नः । तु॒ज॒ता । कि॒ये॒धाः ॥

Mantra without Swara
अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद्वज्रं स्वपस्तमं स्वर्यं१ रणाय। वृत्रस्य चिद्विदद्येन मर्म तुजन्नीशानस्तुजता कियेधाः ॥

अस्मै। इत्। ऊँ इति। त्वष्टा। तक्षत्। वज्रम्। स्वपःऽतमम्। स्वर्यम्। रणाय। वृत्रस्य। चित्। विदत्। येन। मर्म। तुजन्। ईशानः। तुजता। कियेधाः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 28 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को उचित है कि जो (त्वष्टा) प्रकाश करने (ईशानः) समर्थ (कियेधाः) कितनों को धारण करनेवाला शत्रुओं को (तुजन्) मारता हुआ (वृत्रस्य) मेघ के ऊपर अपने किरणों को छोड़ता (विदत्) प्राप्त होते हुए सूर्य के समान (स्वर्यम्) सुख के हेतु (स्वपस्तमम्) अतिशय करके उत्तम कर्मों के उत्पन्न करनेवाले (वज्रम्) किरणसमूह को (तक्षत्) छेदन करते हुए सूर्य के (चित्) समान (अस्मै) इस (रणाय) सङ्ग्राम के वास्ते जिस (मर्म) जीवननिमित्त स्थान को (तुजता) काटते हुए (येन) जिस वज्र से शत्रुओं को जीतता है, (इदु) उसी को सभा आदि का अध्यक्ष करना चाहिये ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अपने प्रताप से मेघ को छिन्न-भिन्न कर भूमि में जल को गिरा के सबको सुखी करता है, वैसे ही सभा आदि का अध्यक्ष विद्या, विनय वा शस्त्र-अस्त्रों के सीखने-सिखाने से युद्धों में कुशल सेना को सिद्ध कर, शत्रुओं को जीत कर, सब प्राणियों को आनन्दित किया करे ॥ ६ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥