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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 5

191 Sukta
16 Mantra
1/61/5
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒स्मा इदु॒ सप्ति॑मिव श्रव॒स्येन्द्रा॑या॒र्कं जु॒ह्वा॒३॒॑ सम॑ञ्जे। वी॒रं दा॒नौक॑सं व॒न्दध्यै॑ पु॒रां गू॒र्तश्र॑वसं द॒र्माण॑म् ॥

अ॒स्मै । इत् । ऊँ॒ इति॑ । सप्ति॑म्ऽइव । श्र॒व॒स्या । इन्द्रा॑य । अ॒र्कम् । जु॒ह्वा॑ । सम् । अ॒ञ्जे॒ । वी॒रम् । दा॒नऽओ॑कसम् । व॒न्दध्यै॑ । पु॒राम् । गू॒र्तऽश्र॑वसम् । द॒र्माण॑म् ॥

Mantra without Swara
अस्मा इदु सप्तिमिव श्रवस्येन्द्रायार्कं जुह्वा३ समञ्जे। वीरं दानौकसं वन्दध्यै पुरां गूर्तश्रवसं दर्माणम् ॥

अस्मै। इत्। ऊँ इति। सप्तिम्ऽइव। श्रवस्या। इन्द्राय। अर्कम्। जुह्वा। सम्। अञ्जे। वीरम्। दानऽओकसम्। वन्दध्यै। पुराम्। गूर्तऽश्रवसम्। दर्माणम् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 27 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (श्रवस्या) अपने करने की इच्छा (जुह्वा) विद्याओं के लेने-देनेवाली क्रियाओं से (अस्मै) इस (इन्द्राय) परमैश्वर्य प्राप्त करनेवाले (इत्) सभाध्यक्ष का ही (उ) विशेष तर्क के साथ (वन्दध्यै) स्तुति कराने के लिये (सप्तिमिव) वेगवाले घोड़े के समान (गूर्त्तश्रवसम्) जिसने सब शास्त्रों के श्रवणों को ग्रहण किया है (पुराम्) शत्रुओं के नगरों के (दर्माणम्) विदारण करने वा (दानौकसम्) दान वा स्थानयुक्त (अर्कम्) सत्कार के हेतु (वीरम्) विद्या शौर्यादि गुणयुक्त वीर (इत्) ही को (समञ्जे) अच्छे प्रकार कामना करता हूँ, वैसी तुम भी कामना किया करो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य लोग रथ में घोड़े को जोड़ उस के ऊपर स्थित होकर जाने-आने से कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे वर्त्तमान विद्वान् वीर पुरुषों के सङ्ग से सब कार्यों को मनुष्य लोग सिद्ध करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥