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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 4

191 Sukta
16 Mantra
1/61/4
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒स्मा इदु॒ स्तोमं॒ सं हि॑नोमि॒ रथं॒ न तष्टे॑व॒ तत्सि॑नाय। गिर॑श्च॒ गिर्वा॑हसे सुवृ॒क्तीन्द्रा॑य विश्वमि॒न्वं मेधि॑राय ॥

अ॒स्मै । इत् । ऊँ॒ इति॑ । स्तोम॑म् । सम् । हि॒नो॒मि॒ । रथ॑म् । न । तष्टा॑ऽइव । तत्ऽसि॑नाय । गिरः॑ । च॒ । गिर्वा॑हसे । सु॒ऽवृ॒क्ति । इन्द्रा॑य । वि॒श्व॒म्ऽइ॒न्वम् । मेधि॑राय ॥

Mantra without Swara
अस्मा इदु स्तोमं सं हिनोमि रथं न तष्टेव तत्सिनाय। गिरश्च गिर्वाहसे सुवृक्तीन्द्राय विश्वमिन्वं मेधिराय ॥

अस्मै। इत्। ऊँ इति। स्तोमम्। सम्। हिनोमि। रथम्। न। तष्टाऽइव। तत्ऽसिनाय। गिरः। च। गिर्वाहसे। सुऽवृक्ति। इन्द्राय। विश्वम्ऽइन्वम्। मेधिराय ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 27 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (मेधिराय) अच्छे प्रकार जानने (गिर्वाहसे) विद्यायुक्त वाणियों को प्राप्त करानेवाले (अस्मै) इस (इन्द्राय) विद्या की वृष्टि करनेवाले विद्वान् (इत्) ही के लिये (उ) तर्कपूर्वक (रथम्) यानसमूह के (न) समान (तत्सिनाय) यानसमूह के बन्धन के लिये (तष्टेव) तीक्ष्ण करनेवाले कारीगर के तुल्य (विश्वमिन्वम्) सब विज्ञान को प्राप्त कराने (सुवृक्ति) जिससे सब दोषों को छो़ड़ते हैं, उस (स्तोमम्) शास्त्रों के अभ्यासयुक्त स्तुति (च) और (गिरः) वेदवाणियों को (संहिनोमि) सम्यक् बढ़ाता हूँ, वैसे तुम भी प्रयत्न किया करो ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रथ का बनानेवाला दृढ़ रथ के बनाने के वास्ते उत्तम बन्धनों के सहित यन्त्रकलाओं को अच्छे प्रकार रच कर अपने प्रयोजनों को सिद्ध करता और सुखपूर्वक जाना-आना करके आनन्दित होता है, वैसे ही मनुष्य विद्वान् का आश्रय लेकर उस के सम्बन्ध से धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करके सदा आनन्द में रहें ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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