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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 15

191 Sukta
16 Mantra
1/61/15
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒स्मा इदु॒ त्यदनु॑ दाय्येषा॒मेको॒ यद्व॒व्ने भूरे॒रीशा॑नः। प्रैत॑शं॒ सूर्ये॑ पस्पृधा॒नं सौव॑श्व्ये॒ सुष्वि॑माव॒दिन्द्रः॑ ॥

अ॒स्मै । इत् । ऊँ॒ इति॑ । त्यत् । अनु॑ । दा॒यि॒ । ए॒षा॒म् । एकः॑ । यत् । व॒व्ने । भूरेः॑ । ईशा॑नः । प्र । एत॑शम् । सूर्ये॑ । प॒स्पृ॒धा॒नम् । सौव॑श्व्ये । सुष्वि॑म् । आ॒व॒त् । इन्द्रः॑ ॥

Mantra without Swara
अस्मा इदु त्यदनु दाय्येषामेको यद्वव्ने भूरेरीशानः। प्रैतशं सूर्ये पस्पृधानं सौवश्व्ये सुष्विमावदिन्द्रः ॥

अस्मै। इत्। ऊँ इति। त्यत्। अनु। दायि। एषाम्। एकः। यत्। वव्ने। भूरेः। ईशानः। प्र। एतशम्। सूर्ये। पस्पृधानम्। सौवश्व्ये। सुष्विम्। आवत्। इन्द्रः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 29 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे विद्वानों ने (एषाम्) इन मनुष्यादि प्राणियों को सुख (दायि) दिया हो वैसे जो (एकः) उत्तम से उत्तम सहाय रहित (भूरेः) अनेक प्रकार के ऐश्वर्य्य का (ईशानः) स्वामी (इन्द्रः) सभा आदि का पति (सूर्ये) सूर्य्यमण्डल में है, वैसे (सौवश्व्ये) उत्तम-उत्तम घोड़े से युक्त सेना में (यत्) जिस (पस्पृधानम्) परस्पर स्पर्द्धा करते हुए (सुष्विम्) उत्तम ऐश्वर्य्य के देनेवाले (एतशम्) घोड़े की (अनुवव्ने) यथायोग्य याचना करता है (त्यत्) उसको (अस्मै) इस (इदु) सभाध्यक्ष ही के लिये (प्रावत्) अच्छे प्रकार रक्षा करता है, वह सभा के योग्य होता है ॥ १५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जो बहुत सुख देने तथा घोड़ों की विद्या को जाननेवाला और उपमारहित पुरुषार्थी विद्वान् मनुष्य है, उसी को प्रजा की रक्षा करने में नियुक्त करें और बिजुली की विद्या का ग्रहण भी अवश्य करें ॥ १५ ॥
Subject
फिर उक्त सभाध्यक्ष और विद्युत् कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥