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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 14

191 Sukta
16 Mantra
1/61/14
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्येदु॑ भि॒या गि॒रय॑श्च दृ॒ळ्हा द्यावा॑ च॒ भूमा॑ ज॒नुष॑स्तुजेते। उपो॑ वे॒नस्य॒ जोगु॑वान ओ॒णिं स॒द्यो भु॑वद्वी॒र्या॑य नो॒धाः ॥

अ॒स्य । इत् । ऊँ॒ इति॑ । भि॒या । गि॒रयः॑ । च॒ । दृ॒ळ्हाः । द्यावा॑ । च॒ । भूमा॑ । ज॒नुषः॑ । तु॒जे॒ते॒ इति॑ । उपो॒ इति॑ । वे॒नस्य॑ । जोगु॑वानः । ओ॒णिम् । स॒द्यः । भु॒व॒त् । वी॒र्या॑य । नो॒धाः ॥

Mantra without Swara
अस्येदु भिया गिरयश्च दृळ्हा द्यावा च भूमा जनुषस्तुजेते। उपो वेनस्य जोगुवान ओणिं सद्यो भुवद्वीर्याय नोधाः ॥

अस्य। इत्। ऊँ इति। भिया। गिरयः। च। दृळ्हाः। द्यावा। च। भूमा। जनुषः। तुजेते इति। उपो इति। वेनस्य। जोगुवानः। ओणिम्। सद्यः। भुवत्। वीर्याय। नोधाः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 29 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (जोगुवानः) अव्यक्त शब्द करने (नोधाः) सेना का नायक सभा आदि का अध्यक्ष (सद्यः) शीघ्र (वीर्य्याय) पराक्रम के सिद्ध करने के लिये (भुवत्) हो जैसे सूर्य से (दृढाः) पुष्ट (गिरयः) मेघ के समान (अस्य) इस (वेनस्य) मेधावी के (इत्) (उ) ही (भिया) भय से (च) शत्रुजन कम्पायमान होते हैं, जैसे (द्यावा) प्रकाश (च) और भूमि (तुजेते) काँपते हैं, वैसे (जनुषः) मनुष्य लोग भय को प्राप्त होते हैं, वैसे हम लोग उस सभाध्यक्ष के (उपो) निकट भय को प्राप्त न (भूम) हों और वह सभाध्यक्ष भी (ओणिम्) दुःख को दूरकर सुख को प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यह सबको निश्चय समझना चाहिये कि विद्या आदि उत्तम गुण तथा ईश्वर से जगत् के उत्पन्न होने विना सभाध्यक्ष आदि प्रजा का पालन करने और जैसे सूर्य सब लोकों को प्रकाशित तथा धारण करने को समर्थ नहीं हो सकता, इसलिये विद्या आदि श्रेष्ठगुणों और परमेश्वर ही की प्रशंसा और स्तुति करना उचित है ॥ १४ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥