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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 13

191 Sukta
16 Mantra
1/61/13
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒स्येदु॒ प्र ब्रू॑हि पू॒र्व्याणि॑ तु॒रस्य॒ कर्मा॑णि॒ नव्य॑ उ॒क्थैः। यु॒धे यदि॑ष्णा॒न आयु॑धान्यृघा॒यमा॑णो निरि॒णाति॒ शत्रू॑न् ॥

अ॒स्य । इत् । ऊँ॒ इति॑ । प्र । ब्रू॒हि॒ । पू॒र्व्याणि॑ । तु॒रस्य॑ । कर्मा॑णि । नव्यः॑ । उ॒क्थैः । यु॒धे । यत् । इ॒ष्णा॒नः । आयु॑धानि । ऋ॒घा॒यमा॑णः । नि॒ऽरि॒णाति॑ । शत्रू॑न् ॥

Mantra without Swara
अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः। युधे यदिष्णान आयुधान्यृघायमाणो निरिणाति शत्रून् ॥

अस्य। इत्। ऊँ इति। प्र। ब्रूहि। पूर्व्याणि। तुरस्य। कर्माणि। नव्यः। उक्थैः। युधे। यत्। इष्णानः। आयुधानि। ऋघायमाणः। निऽरिणाति। शत्रून् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 29 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वन् मनुष्य ! (यत्) जो सभा आदि का पति जैसे (ऋघायमाणः) मरे हुए के समान आचरण करनेवाले (आयुधानि) तोप, बन्दूक, तलवार आदि शस्त्र-अस्त्रों को (इष्णानः) नित्य-नित्य सम्हालते और शोधते हुए (नव्यः) नवीन शस्त्रास्त्र विद्या को पढ़े हुए आप (युधे) संग्राम में (शत्रून्) दुष्ट शत्रुओं को (निरिणाति) मारते हो, उस (तुरस्य) शीघ्रतायुक्त (अस्य) सभापति आदि के (इत्) ही (उक्थैः) कहने योग्य वचनों से (पूर्व्याणि) प्राचीन सत्पुरुषों ने किये (कर्माणि) करने योग्य और करनेवाले को अत्यन्त इष्ट कर्मों को करता है, वैसे (प्र ब्रूहि) अच्छे प्रकार कहो ॥ १३ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सभाध्यक्ष आदि के विद्या, विनय, न्याय और शत्रुओं को जीतना आदि कर्मों की प्रशंसा करके और उत्साह देकर इन का सदा सत्कार करें तथा इन सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों से शस्त्रास्त्र चलाने की शिक्षा और शिल्पविद्या की चतुराई को प्राप्त हुए सेना में रहनेवाले वीर पुरुषों के साथ शत्रुओं को जीत कर प्रजा की निरन्तर रक्षा करें ॥ १३ ॥
Subject
फिर वह सभाध्यक्ष क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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