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Rigveda Mandal 1 / Sukta 61 / Mantra 10

191 Sukta
16 Mantra
1/61/10
Devata- इन्द्र: Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒स्येदे॒व शव॑सा शु॒षन्तं॒ वि वृ॑श्च॒द्वज्रे॑ण वृ॒त्रमिन्द्रः॑। गा न व्रा॒णा अ॒वनी॑रमुञ्चद॒भि श्रवो॑ दा॒वने॒ सचे॑ताः ॥

अ॒स्य । इत् । ए॒व । शव॑सा । शु॒षन्तम् । वि । वृ॒श्च॒त् । वज्रे॑ण । वृ॒त्रम् । इन्द्रः॑ । गाः । न । व्रा॒णाः । अ॒वनीः॑ । अ॒मु॒ञ्च॒त् । अ॒भि । श्रवः॑ । दा॒वने॑ । सऽचे॑ताः ॥

Mantra without Swara
अस्येदेव शवसा शुषन्तं वि वृश्चद्वज्रेण वृत्रमिन्द्रः। गा न व्राणा अवनीरमुञ्चदभि श्रवो दावने सचेताः ॥

अस्य। इत्। एव। शवसा। शुषन्तम्। वि। वृश्चत्। वज्रेण। वृत्रम्। इन्द्रः। गाः। न। व्राणाः। अवनीः। अमुञ्चत्। अभि। श्रवः। दावने। सऽचेताः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 28 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सचेताः) तुल्य ज्ञानवान् (इन्द्रः) सेनाधिपति (अस्य) इस सभाध्यक्ष (एव) ही के (शवसा) बल तथा (वज्रेण) तेज से (शुषन्तम्) द्वेष से क्षीण हुए (वृत्रम्) प्रकाश के आवरण करनेवाले मेघ के समान आवरण करनेवाले शत्रु को (विवृश्चत्) छेदन करता है, वह (गाः) पशुओं को पशुओं के पालनेवाले बन्धन से छुड़ाकर वन को प्राप्त करते हुए के (न) समान (अवनीः) पृथिवी को (व्राणाः) आवरण किये हुए जल के तुल्य (दावने) देनेवाले के लिये (श्रवः) अन्न को (इत्) भी (अभ्यमुञ्चत्) सब प्रकार से छोड़ता है, वह राज्य करने को समर्थ होता है ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। जैसे बिजुली के सहाय से सूर्य्य वा सूर्य्य के सहाय से बिजुली बढ़ के विश्व को प्रकाशित और मेघ को छिन्न-भिन्न कर भूमि में गिरा देती है, जैसे गौओं का पालनेवाला गौऔं को बन्धन से छोड़कर सुखी करता है, वैसे ही सभा सेना के अध्यक्ष मनुष्य न्याय की रक्षा और शत्रुओं को छिन्न-भिन्न और धार्मिकों को दुःखरूपी बन्धनों से छुड़ाकर सुखी करें ॥ १० ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।