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Rigveda Mandal 1 / Sukta 60 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/60/3
Devata- अग्निः Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तं नव्य॑सी हृ॒द आ जाय॑मानम॒स्मत्सु॑की॒र्तिर्मधु॑जिह्वमश्याः। यमृ॒त्विजो॑ वृ॒जने॒ मानु॑षासः॒ प्रय॑स्वन्त आ॒यवो॒ जीज॑नन्त ॥

तम् । नव्य॑सी । हृ॒दः । आ । जाय॑मानम् । अ॒स्मत् । सु॒ऽकी॒र्तिः । मधु॑ऽजिह्वम् । अ॒श्याः॒ । यम् । ऋ॒त्विजः॑ । वृ॒जने॑ । मानु॑षासः । प्रय॑स्वन्तः । आ॒यवः॑ । जीज॑नन्त ॥

Mantra without Swara
तं नव्यसी हृद आ जायमानमस्मत्सुकीर्तिर्मधुजिह्वमश्याः। यमृत्विजो वृजने मानुषासः प्रयस्वन्त आयवो जीजनन्त ॥

तम्। नव्यसी। हृदः। आ। जायमानम्। अस्मत्। सुऽकीर्तिः। मधुऽजिह्वम्। अश्याः। यम्। ऋत्विजः। वृजने। मानुषासः। प्रयस्वन्तः। आयवः। जीजनन्त ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 26 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्य ! जैसे (ऋत्विजः) ऋतुओं के योग्य कर्मकर्त्ता (प्रयस्वन्तः) उत्तम विज्ञानयुक्त (आयवः) सत्याऽसत्य का विवेक करनेहारे (हृदः) सबके मित्र (मानुषासः) विद्वान् मनुष्य जानने की इच्छा करनेवालों को (वृजने) अधर्मरहित धर्ममार्ग में (जीजनन्त) विद्याओं से प्रकट कर देते हैं, जिस (जायमानम्) प्रसिद्ध हुए (मधुजिह्वम्) स्वादिष्ट भोग को (नव्यसी) अति नूतन प्रजा सेवन करती है (तम्) उसको (अस्मत्) हम से प्राप्त हुई शिक्षा से युक्त (सुकीर्त्तिः) अति प्रशंसा के योग्य तू (आश्याः) अच्छे प्रकार भोग कर ॥ ३ ॥
Essence
मनुष्यों को उचित है कि जो अधर्म को छुड़ा के धर्म का ग्रहण कराते हैं, उन का सब प्रकार से सन्मान किया करें ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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