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Rigveda Mandal 1 / Sukta 59 / Mantra 6

191 Sukta
7 Mantra
1/59/6
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र नू म॑हि॒त्वं वृ॑ष॒भस्य॑ वोचं॒ यं पू॒रवो॑ वृत्र॒हणं॒ सच॑न्ते। वै॒श्वा॒न॒रो दस्यु॑म॒ग्निर्ज॑घ॒न्वाँ अधू॑नो॒त्काष्ठा॒ अव॒ शम्ब॑रं भेत् ॥

प्र । नु । म॒हि॒ऽत्वम् । वृ॒ष॒भस्य॑ । वो॒च॒म् । यम् । पू॒रवः॑ । वृ॒त्र॒ऽहन॑म् । सच॑न्ते । वै॒श्वा॒न॒रः । दस्यु॑म् । अ॒ग्निः । ज॒घ॒न्वान् । अधू॑नोत् । काष्ठाः॑ । अव॑ । शम्ब॑रम् । भे॒त् ॥

Mantra without Swara
प्र नू महित्वं वृषभस्य वोचं यं पूरवो वृत्रहणं सचन्ते। वैश्वानरो दस्युमग्निर्जघन्वाँ अधूनोत्काष्ठा अव शम्बरं भेत् ॥

प्र। नु। महिऽत्वम्। वृषभस्य। वोचम्। यम्। पूरवः। वृत्रऽहनम्। सचन्ते। वैश्वानरः। दस्युम्। अग्निः। जघन्वान्। अधूनोत्। काष्ठाः। अव। शम्बरम्। भेत् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 25 Mantra » 6

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Meaning
(तम्) जिस परमेश्वर को (पूरवः) विद्वान् लोग अपने आत्मा के साथ (सचन्ते) युक्त करते हैं, जैसे (अग्निः) सर्वत्र व्यापक विद्युत् (वृत्रहणम्) मेघ के नाशकर्त्ता सूर्य को दिखलाती है, जैसे (वैश्वानरः) सम्पूर्ण प्रजा को नियम में रखनेवाला सूर्य्य (दस्युम्) डाकू के तुल्य (शम्बरम्) मेघ को (जघन्वान्) हनन (अधूनोत्) कँपाता (अवभेत्) विदीर्ण करता है, जिस के बीच में (काष्ठाः) दिशा भी व्याप्य है, उस (वृषभस्य) सब से उत्तम सूर्य के (महित्वम्) महिमा को मैं (नु) शीघ्र (प्रवोचम्) प्रकाशित करूँ, वैसे सब विद्वान् लोग किया करें ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस की महिमा को सब संसार प्रकाशित करता है, वही अनन्त शक्तिमान् परमेश्वर सबको उपासना के योग्य है ॥ ६ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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