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Rigveda Mandal 1 / Sukta 59 / Mantra 4

191 Sukta
7 Mantra
1/59/4
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
बृ॒ह॒तीइ॑व सू॒नवे॒ रोद॑सी॒ गिरो॒ होता॑ मनु॒ष्यो॒३॒॑ न दक्षः॑। स्व॑र्वते स॒त्यशु॑ष्माय पू॒र्वीर्वै॑श्वान॒राय॒ नृत॑माय य॒ह्वीः ॥

बृ॒ह॒तीइ॒वेति॑ बृह॒तीऽइ॑व । सू॒नवे॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । गिरः॑ । होता॑ । म॒नु॒ष्यः॑ । न । दक्षः॑ । स्वः॑ऽवते । स॒त्यऽशु॑ष्माय । पू॒र्वीः । वै॒श्वा॒न॒राय॑ । नृऽत॑माय । य॒ह्वीः ॥

Mantra without Swara
बृहतीइव सूनवे रोदसी गिरो होता मनुष्यो३ न दक्षः। स्वर्वते सत्यशुष्माय पूर्वीर्वैश्वानराय नृतमाय यह्वीः ॥

बृहतीइवेति बृहतीऽइव। सूनवे। रोदसी इति। गिरः। होता। मनुष्यः। न। दक्षः। स्वःऽवते। सत्यऽशुष्माय। पूर्वीः। वैश्वानराय। नृऽतमाय। यह्वीः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (सूनवे) पुत्र के लिये (बृहतीइव) महागुणयुक्त माता वर्त्तती है, जैसे (रोदसी) प्रकाश भूमि और (दक्षः) चतुर (मनुष्यः) पढ़ानेहारे विद्वान् मनुष्य पिता के (न) समान (होता) देने-लेनेवाला विद्वान् ईश्वर वा सभापति विद्वान् में प्रसन्न होता है, जैसे विद्वान् लोग इस (स्वर्वते) प्रशंसनीय सुख वर्त्तमान (सत्यशुष्माय) सत्यबलयुक्त (नृतमाय) पुरुषों में उत्तम (वैश्वानराय) परमेश्वर के लिये (पूर्वीः) सनातन (यह्वीः) महागुण लक्षणयुक्त (गिरः) वेदवाणियों को (दधिरे) धारण करते हैं, वैसे ही परमेश्वर के उपासक सभाध्यक्ष में सब मनुष्यों को वर्त्तना चाहिये ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे भूमि वा सूर्यप्रकाश सबको धारण करके सुखी करते हैं, जैसे पिता वा अध्यापक पुत्र के हित के लिये प्रवृत्त होता है, जैसे परमेश्वर प्रजासुख के वास्ते वर्तता है, वैसे सभापति प्रजा के अर्थ वर्ते, इस प्रकार सब देववाणियाँ प्रतिपादन करती हैं ॥ ४ ॥
Subject
अब अगले मन्त्र में पुरुषोत्तम के गुणों का उपदेश किया है ॥