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Rigveda Mandal 1 / Sukta 59 / Mantra 2

191 Sukta
7 Mantra
1/59/2
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मू॒र्धा दि॒वो नाभि॑र॒ग्निः पृ॑थि॒व्या अथा॑भवदर॒ती रोद॑स्योः। तं त्वा॑ दे॒वासो॑ऽजनयन्त दे॒वं वैश्वा॑नर॒ ज्योति॒रिदार्या॑य ॥

मू॒र्धा । दि॒वः । नाभिः॑ । अ॒ग्निः । पृ॒थि॒व्याः । अथ॑ । अ॒भ॒व॒त् । अ॒र॒तिः । रोद॑स्योः । तम् । त्वा॒ । दे॒वासः॑ । अ॒ज॒न॒य॒न्त॒ । दे॒वम् । वैश्वा॑नर । ज्योतिः॑ । इत् । आर्या॑य ॥

Mantra without Swara
मूर्धा दिवो नाभिरग्निः पृथिव्या अथाभवदरती रोदस्योः। तं त्वा देवासोऽजनयन्त देवं वैश्वानर ज्योतिरिदार्याय ॥

मूर्धा। दिवः। नाभिः। अग्निः। पृथिव्याः। अथ। अभवत्। अरतिः। रोदस्योः। तम्। त्वा। देवासः। अजनयन्त। देवम्। वैश्वानर। ज्योतिः। इत्। आर्याय ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 25 Mantra » 2

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Meaning
हे (वैश्वानर) सब संसार के नायक ! जो आप (अग्निः) बिजुली के समान (दिवः) प्रकाश वा (पृथिव्याः) भूमि के मध्य समान (मूर्द्धा) उत्कृष्ट और (नाभिः) मध्यवर्त्तिव्यापक (अभवत्) होते हो (अथ) इन सब लोकों की रचना के अनन्तर जो (रोदस्योः) प्रकाश और अप्रकाश रूप सूर्यादि और भूमि आदि लोकों के (अरतिः) आप व्यापक होके अध्यक्ष (अभवत्) होते हो, जो (आर्याय) उत्तम गुण, कर्म, स्वभाववाले मनुष्य के लिये (ज्योतिः) ज्ञानप्रकाश वा मूर्त्त द्रव्यों के प्रकाश को (इत्) ही करते हैं, जिस (देवम्) प्रकाशमान (त्वा) आपको (देवासः) विद्वान् लोग (अजनयन्त) प्रकाशित करते हैं वा जिस बिजुलीरूप अग्नि को विद्वान् लोग (अजनयन्त) प्रकट करते हैं (तम्) उस आप ही की उपासना हम लोग करें ॥ २ ॥
Essence
जिस जगदीश्वर ने आर्य अर्थात् उत्तम मनुष्यों के विज्ञान के लिये सब विद्याओं के प्रकाश करनेवाले वेदों को प्रकाशित किया है तथा जो सब से उत्तम सब का आधार जगदीश्वर है, उस को जानकर मनुष्यों को उसी की उपासना करनी चाहिये ॥ २ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥

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