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Rigveda Mandal 1 / Sukta 58 / Mantra 9

191 Sukta
9 Mantra
1/58/9
Devata- अग्निः Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भवा॒ वरू॑थं गृण॒ते वि॑भावो॒ भवा॑ मघवन्म॒घव॑द्भ्यः॒ शर्म॑। उ॒रु॒ष्याग्ने॒ अंह॑सो गृ॒णन्तं॑ प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात् ॥

भव॑ । वरू॑थम् । गृ॒ण॒ते । वि॒भा॒ऽवः॒ । भव॑ । म॒घ॒व॒न् । म॒घव॑त्ऽभ्यः । शर्म॑ । उ॒रु॒ष्य । अ॒ग्ने॒ । अंह॑सः । गृ॒णन्त॑म् । प्रा॒तः । म॒क्षु । धि॒याऽव॑सुः । ज॒ग॒म्या॒त् ॥

Mantra without Swara
भवा वरूथं गृणते विभावो भवा मघवन्मघवद्भ्यः शर्म। उरुष्याग्ने अंहसो गृणन्तं प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्यात् ॥

भव। वरूथम्। गृणते। विभाऽवः। भव। मघवन्। मघवत्ऽभ्यः। शर्म। उरुष्य। अग्ने। अंहसः। गृणन्तम्। प्रातः। मक्षु। धियाऽवसुः। जगम्यात् ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 24 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) उत्तम धनवाले (अग्ने) विज्ञान आदि गुणयुक्त सभाध्यक्ष विद्वन् ! तू (गृणते) गुणों के कीर्त्तन करनेवाले और (मघवद्भ्यः) विद्यादि धनयुक्त विद्वानों के लिये (वरूथम्) घर को और (शर्म) सुख को (विभावः) प्राप्त कीजिये तथा आप भी घर और सुख को (भव) प्राप्त हो (गृणन्तम्) स्तुति करते हुए मनुष्य को (अंहसः) पाप से (मक्षु) शीघ्र (उरुष्य) रक्षा कीजिये आप भी पाप से अलग (भव) हूजिये, ऐसा जो (धियावसुः) प्रज्ञा वा कर्म से वास कराने योग्य (प्रातः) प्रतिदिन प्रजा की रक्षा करता है, वह सुखों को (जगम्यात्) अतिशय करके प्राप्त होवे ॥ ९ ॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि जो विद्वान् धर्म वा विनय से सब प्रजा को शिक्षा देकर पालना करता है, उसी को सभा आदि का अध्यक्ष करें ॥ ९ ॥ इस सूक्त में अग्नि वा विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥
Subject
फिर वह सभापति कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥