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Rigveda Mandal 1 / Sukta 58 / Mantra 8

191 Sukta
9 Mantra
1/58/8
Devata- अग्निः Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अच्छि॑द्रा सूनो सहसो नो अ॒द्य स्तो॒तृभ्यो॑ मित्रमहः॒ शर्म॑ यच्छ। अग्ने॑ गृ॒णन्त॒मंह॑स उरु॒ष्योर्जो॑ नपात्पू॒र्भिराय॑सीभिः ॥

अच्छि॑द्रा । सू॒नो॒ इति॑ । स॒ह॒सः॒ । नः॒ । अ॒द्य । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । मि॒त्र॒ऽम॒हः॒ । शर्म॑ । य॒च्छ॒ । अग्ने॑ । गृ॒णन्त॑म् । अंह॑सः । उ॒रु॒ष्य॒ । ऊर्जः॑ । न॒पा॒त् । पूः॒ऽभिः । आय॑सीभिः ॥

Mantra without Swara
अच्छिद्रा सूनो सहसो नो अद्य स्तोतृभ्यो मित्रमहः शर्म यच्छ। अग्ने गृणन्तमंहस उरुष्योर्जो नपात्पूर्भिरायसीभिः ॥

अच्छिद्रा। सूनो इति। सहसः। नः। अद्य। स्तोतृऽभ्यः। मित्रऽमहः। शर्म। यच्छ। अग्ने। गृणन्तम्। अंहसः। उरुष्य। ऊर्जः। नपात्। पूःऽभिः। आयसीभिः ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहसः) पूर्ण ब्रह्मचर्य्य से शरीर और विद्या से आत्मा के बलयुक्त जन का (सूनो) पुत्र (मित्रमहः) सबके मित्र और पूजनीय (अग्नेः) अग्निवत् प्रकाशमान विद्वन् ! (नपात्) नीच कक्षा में न गिरनेवाला तू (अद्य) आज अपने आत्मस्वरूप के उपदेश से (नः) हम को (अंहसः) पापाचरण से (पाहि) अलग रक्षा कर (अच्छिद्रा) छेद-भेद रहित (शर्म) सुखों को (यच्छ) प्राप्त कर (स्तोतृभ्यः) विद्वानों से विद्याओं की प्राप्ति हम को करा। हे विद्वन् ! तू आत्मा की (गृणन्तम्) स्तुति के कर्त्ता को (आयसीभिः) सुवर्ण आदि आभूषणों की ईश्वर की रचनारूप (पूर्भिः) रक्षा करने में समर्थ अन्न आदि क्रियाओं के साथ (ऊर्जः) पराक्रम के बल से (उरुष्य) दुःख से पृथक् रख ॥ ८ ॥
Essence
हे आत्मा और परमात्मा को जाननेवाले योगी लोगो ! तुम आत्मा और परमात्मा के उपदेश से सब मनुष्यों को दुःख से दूर करके निरन्तर सुखी किया करो ॥ ८ ॥
Subject
अब आत्मज्ञ योगीजन कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥