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Rigveda Mandal 1 / Sukta 58 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/58/4
Devata- अग्निः Rishi- नोधा गौतमः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि वात॑जूतो अत॒सेषु॑ तिष्ठते॒ वृथा॑ जु॒हूभिः॒ सृण्या॑ तुवि॒ष्वणिः॑। तृ॒षु यद॑ग्ने व॒निनो॑ वृषा॒यसे॑ कृ॒ष्णं त॒ एम॒ रुश॑दूर्मे अजर ॥

वि । वात॑ऽजूतः । अ॒त॒सेषु॑ । ति॒ष्ठ॒ते॒ । वृथा॑ । जु॒हूभिः॑ । सृण्या॑ । तु॒वि॒ऽस्वणिः॑ । तृ॒षु । यत् । अ॒ग्ने॒ । व॒निनः॑ । वृ॒ष॒ऽयसे॑ । कृ॒ष्णम् । ते॒ । एम॑ । रुश॑त्ऽऊर्मे । अ॒ज॒र॒ ॥

Mantra without Swara
वि वातजूतो अतसेषु तिष्ठते वृथा जुहूभिः सृण्या तुविष्वणिः। तृषु यदग्ने वनिनो वृषायसे कृष्णं त एम रुशदूर्मे अजर ॥

वि। वातऽजूतः। अतसेषु। तिष्ठते। वृथा। जुहूभिः। सृण्या। तुविऽस्वणिः। तृषु। यत्। अग्ने। वनिनः। वृषऽयसे। कृष्णम्। ते। एम। रुशत्ऽऊर्मे। अजर ॥

Ashtak » 1 Adhyay » 4 Varga » 23 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (रुशदूर्मे) अपने स्वभाव से गतिशील (अजर) वृद्धावस्था से रहित (अग्ने) बिजुली के तुल्य वर्त्तमान जीव ! जो तू (अतसेषु) आकाशादि व्यापक पदार्थों में (वितिष्ठते) ठहरता (यत्) जो (वातजूतः) वायु का प्रेरक और वायु के समान वेगवाला (तुविष्वणिः) बहुत पदार्थों का सेवक (जुहूभिः) ग्रहण करने के साधनरूप क्रियाओं और (सृण्या) धारण तथा हननरूप कर्म्म से सह वर्त्तमान (वनिनः) विद्युत् युक्त प्राणों को प्राप्त होके तू (तृषु) शीघ्र (वृषायसे) बलवान् होता है, जिस (ते) तेरे (कृष्णम्) कर्षणरूप गुण को हम लोग (एम) प्राप्त होते हैं, सो तू (वृथा) अभिमान को छोड़ के अपने स्वरूप को जान ॥ ४ ॥
Essence
सब मनुष्यों को ईश्वर उपदेश करता है कि जैसा मैंने जीव के स्वभाव का उपदेश किया है, वही तुम्हारा स्वरूप है, यह निश्चित जानो ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ॥